64 तंत्र में दस महाविद्या प्रधान उपासना है। सप्तऋषि सहित सभी सिद्ध मुनि इन दस महाविद्या उपासना से ही सिद्ध होकर शिवजी की प्रसन्नता प्राप्त कर सके ।
महामाया के प्रधान दस स्वरूपों की पूर्ण उपासना है , जीवन पर्यंत धैर्य और पूर्ण श्रद्धा हो और सद्गुरु का सतत मार्गदर्शन हो तब भगवती के एक स्वरूप की उपासना हो सकती है। पर ब्रह्मविद्या का ज्ञान विधान शब्दों में नहीं लिख सकते क्योंकि हरेक जीव की अनुभूति एक समान नहीँ होती । ये तो अनुभूति के आधार पर सद्गुरु आगे का मार्गदर्शन कर सकते हैं ।
इसलिए ग्रंथो में केवल जानकारी ही होती है । दक्षिणामूर्ति शिवजी से चली गुरु परंपरा में दीक्षित पूर्णाभिषेक सदगुरु जो क्रम से दीक्षित हों वो ही पूर्ण दीक्षा दे सकते हैं। महाविद्या के भगवती के दस स्वरूप ही समय समय पर नारायण के दश अवतार स्वरूप प्रकट हुये हैं ।
किन्तु जो दीक्षित नहीं हैं फिर भी संसार का जीवमात्र भगवती की ही संतान है । ह्रदय में पूर्ण श्रद्धा हो तो कोई भी मनुष्य महाविद्या स्वरूपिणी भगवती की प्रसन्नता प्राप्त करने हेतु पूजा उपासना कर सकते हैं । महाविद्या कवच का पाठ करने से सभी देवी देवताओं प्रसन्नता प्राप्त होती है । कवच का नित्यपाठ करने से जीवन की हर समस्या का निराकरण हो जाता है और जीवन दिव्य हो जाता है ।
श्रीमहाविद्या -कवच (Mahavidya Kavach)
विनियोग:
ॐ अस्य श्रीमहाविद्या कवचस्य श्रीसदाशिव ॠषि:,
उष्णिक छन्द:,
श्रीमहाविद्या देवता,
सर्वसिद्धि प्राप्त्यर्थे पाठे विनियोग:।
ॠष्यादि न्यास!!
श्रीसदा-शिव-ॠषये नम: शिरसि,
उष्णिक-छन्दसे नम: मुखे,
श्रीमहा-विधा-देवतायै नम: ह्रृदि,
सर्वसिद्धि प्राप्त्यार्थे पाठे विनियोगाय नम: सर्वाङ्गे।
*मानस-पूजन!
ॐ पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमहाविधा प्रीत्यर्थे समर्पयामि नम: ।
ॐ हं आकाशतत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीमहाविधा प्रीत्यर्थे समर्पयामि नम:।
ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीमहाविधा प्रीत्यर्थे घ्रापयामी नम: ।
ॐ रं अग्नि -तत्त्वात्मकं दीपं श्रीमहाविधा प्रीत्यर्थे दर्शयामि नम: ।
ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेधं श्रीमहाविधा प्रीत्यर्थे निवेदयामि नम: ।
ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीमहाविधा प्रीत्यर्थे निवेदयामि नम:।
श्रीमहाविद्या -कवचम् (Mahavidya Kavach)
ॐ प्राच्यां रक्षतु मे ताराकामरुप निवासिनी।
आग्नेयां षोडशी पातु, याम्यां धूमावती स्वयम ।।१।।
नैर्ॠत्यां भैरवी पातु, वारुण्यां भुवनेश्वरी।
वायव्यां सततं पातु, छिन्नमस्ता महेश्वरी ।।२।।
कौबेर्यां पातु मे देवी, श्रीविधा बगला-मुखी ।
ऐशान्यां पातु मे नित्यं महात्रिपुर सुन्दरी ।।३।।
उर्ध्वं रक्षतु मे विधा, मातङ्गी पीठ वासिनी ।
सर्वत: पातु मे नित्यं, कामाख्या कालिका स्वयम ।।४।।
ब्रह्म-रुपा-महा-विधा, सर्वविधा-मयी स्वयम ।
शिर्षे रक्षतु मे दुर्गा, भालं श्रीभव-गेहिनी ।।५।।
त्रिपुरा भ्रुयुगे पातु, शर्वाणी पातु नासिकाम ।
चक्षुषी चण्डिका पातु, श्रीत्रे नीलसरस्वती ।।६।।
मुखं सौम्य-मुखी पातु, ग्रिवां रक्षतु पार्वती ।
जिह्वां रक्षतु मे देवी, जिह्वा-ललन भीषणा ।।७।।
वाग्-देवी वदनं पातु वक्ष: पातु महेश्वरी।
बाहु महा-भुजा पातु, करांगुली: सुरेश्वरी ।।८।।
पृष्ठत: पातु भिमास्या, कट्यां देवी दिगम्बरी।
उदरं पातु मे नित्यं, महाविधा महोदरी ।।९।।
उग्र-तारा महा-देवी, जंघोरु परी-रक्षतु ।
गूदं मुष्कं च मेढुं च, नाभीं च सुर-सुन्दरी ।।१०।।
पदांगुली: सदा पातु, भवानी त्रिदशेश्वरी।
रक्तं-मांसास्थी-मज्जादिन, पातु देवी शवासना ।।११।।
महाभयेषु घोरेषु, महाभय-निवारिणी।
पातु देवी महामाया,कामाख्या पीठवासिनी ।।१२।।
भस्माचल-गता दिव्य-सिंहासन-कृताश्रया ।
पातु श्रीकालिका-देवी, सर्वोत्पातेषु सर्वदा ।।१३।।
रक्षाहीनं तु यत स्थानं, कवचेनापि वर्जितम ।
तत्-सर्व सर्वदा पातु, सर्वरक्षण-कारिणी ।।१४।।
नोट:-श्री गुरुदेव की आज्ञा और मार्गदर्शन से करें ,अस्तु, ॐ श्री मात्रे नमः!
भगवानम डॉट कॉम पर हमने आपके लिए कुछ नए भाग भी जोडें है जिससे आपको और भी अन्य जानकारियां प्राप्त होती रहे जैसे | पौराणिक कथाएं | भजन संध्या | आरती संग्रह | व्रत कथाएं | चालीसा संग्रह | मंत्र संग्रह | मंदिर संग्रह | ब्लॉग | इन्हें भी पढ़ें और अपने विचार हमें कमेंट में बताये जिससे हम समय पर अपडेट करते रहे। हमसे जुड़ने के लिए फॉलो करें यू ट्यूब चेनल, इन्स्टाग्राम और फेसबुक से।




