माता पार्वती की तपस्या – प्रेरक कहानी

माता पार्वती की तपस्या - प्रेरक कहानी Mata Parvati Ki Tapasya

प्रेरक कहानी के संग्रह में अनेक प्रेरक कहानी हमने आपके लिए उपलब्ध करायी है साथ ही माता पार्वती और महादेव के कई संवाद है तो आज शंकर और पारवती जी से सम्बंधित एक कहानी स्मरण करिए और ज्ञान को बधैयें और जुड़े रहे भगवानम से :-

भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए, “माता-पार्वती” कठोर तपस्या कर रही थी! उनकी तपस्या पूर्णता की ओर थी। एक समय वह भगवान के चिंतन में ध्यान मग्न बैठी थी। उसी समय उन्हें एक बालक के चीखने की आवाज सुनाई दी।

माता तुरंत उठकर वहां पहुंची। उन्होंने देखा एक मगरमच्छ बालक को पानी के भीतर खींच रहा है।

बालक अपनी जान बचाने के लिए प्रयास कर रहा है- तथा करुण स्वर में पुकार रहा था!और मगरमच्छ उसे आहार बनाने का!

करुणामयी माँ को बालक पर दया आ गई। उन्होंने मगरमच्छ से निवेदन किया- कि बालक को छोड़ दीजिए इसे आहार न बनाएं।

मगरमच्छ बोला: माता यह मेरा आहार है मुझे हर छठे दिन उदर पूर्ति हेतु जो पहले मिलता है,उसे मेरा आहार ब्रह्मा ने निश्चित किया है।

माता ने फिर कहा: आप इसे छोड़ दें- इसके बदले मैं अपनी पूरी तपस्या का फल दुंगी।

ग्राह ने कहा ठीक है! माता ने उसी समय संकल्प कर अपनी पूरी तपस्या का- “पुण्य फल” उस ग्राह को दे दिया।

ग्राह तपस्या के फल को प्राप्त कर- सूर्य की भांति चमक उठा- उसकी बुद्धि भी शुद्ध हो गई।

 उसने कहां माता आप अपना पुण्य वापस ले लें। मैं इस बालक को यू हीं छोड़ दुंगा।

लेकिन माता ने मना कर दिया- तथा बालक को गोद में लेकर ममतामयी माँ- प्यार भरे ममत्व से दुलारने लगी।

बालक को सुरक्षित लौटाकर,माता ने अपने स्थान पर वापस आकर तप शुरु कर दिया।

तभी वहाँ भगवान शिव तुरंत ही प्रकट हो गए,और बोले: पार्वती अब तुम्हें तप करने की आवश्यकता नहीं है।

हर प्राणी में मेरा ही वास है, तुमने उस ग्राह को तप का फल दिया- वह मुझे ही प्राप्त हुआ है।

अत: अब तो तुम्हारा तप फल अनंत गुना हो गया।

तुमने करुणावश द्रवित होकर किसी प्राणी की रक्षा की- अत: मैं तुम पर प्रसन्न हूँ तथा तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ।

कथा का सारंश यही है- कि जो परहित की कामना करता है- उस पर परमात्मा की असीम कृपा होती है।

 “परहित सरस धरम नही भाई” जो व्यक्ति असहायों की सहायता, दयालु प्रेमी करुणाकारी होता है। ईश्वर उसको अवश्य स्वीकार करते हैं।

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