Motivational Story – ईश्वर से क्या मांगना है।

कभी-कभी मैं सोचता हूँ…
अगर आज भगवान हमारे सामने आकर कह दें-“माँगो, जो चाहो…”तो क्या माँगेंगे हम?
पैसा? शक्ति? कुर्सी? job?आराम? हीरे-जवाहरात?
या कुछ ऐसा… जो हमें आजीवन सम्मान दे?

रामायण में बहुत सुंदर कहानी है।
बहुत समय पहले… जब रावण, कुंभकर्ण और विभीषण ने घोर तपस्या की, तब ब्रह्माजी प्रसन्न हुए।
ब्रह्माजी बोले – “माँगो, क्या वरदान माँगते हो?”

पहले रावण आगे बढ़ा।
उसने कहा “देव, देवता, दानव, नाग -कोई मुझे मार न सके।” इच्छानुसार मैं रूप धारण कर सकूँ ।
उसने कहा मनुष्य तो मेरे लिए तिनके समान हैं। उनसे मुझे भय नहीं ।
ब्रह्माजी बोले “तथास्तु“।

फिर कुंभकर्ण का अवसर आया। देवताओं ने कहा-“यह दुर्बुद्धि है, तीनों लोकों को सताएगा।”।सरस्वती जी को उसकी जीभ पर बैठा दिया गया।
ब्रह्माजी ने कहा -“बोलो पुत्र, क्या चाहते हो?”
कुंभकर्ण के होठ खुले…और निकला —
“मुझे वर्षों की गहरी नींद मिले!”

जहाँ अजेयता माँगनी थी, वहाँ निद्रा माँग ली।
देखा आपने?
वरदान वही माँगते हैं, जो हमारे भीतर है। बुद्धि छोटी हो तो वरदान भी छोटा हो जाता है। ब्राह्मण जी बोले “तथास्तु”।

अंत में विभीषण जी की बारी आई।
सर झुका,वाणी में विनम्रता और हृदय में शांति।
उन्होंने कहा प्रभु “आपसे मिलना हो गया। अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए ।”
आगे कहा कि यदि आप प्रसन्न हैं तो एक ही वरदान दीजिए-
“मैं सदैव धर्म पर टीका रहूँ। मेरे विचार कभी अधर्म की ओर न जाएँ।”
सोचिए —
ना राज्य, ना शक्ति, ना सोना सिर्फ़… धर्म पर स्थित होने का वरदान मांगा ।
यही चरित्र था, जो उन्हें अंत में लंका का राजा बनाकर, रामजी का आदरनीय भक्त बना गया।

जब जीवन तुम्हें अवसर देता है, जब समय तुम्हारे द्वार पर खड़ा होता है, जब ईश्वर कहते हैं -माँगो……
तब तुम वही माँगते हो, जो तुम्हारे भीतर है।

रावण ने डर का उपाय माँगा। कुंभकर्ण ने आलस्य माँगा। विभीषण ने धर्म माँगा।
अगली बार ईश्वर जब तुमसे कहेंगे माँगो क्या माँगते हो -क्या माँगोगे??
ये सोचकर बैठना।


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