कभी गौर किया है?
हमारे घरों में, रिश्तों में, ऑफिस में झगड़ा असल में बहुत छोटा होता है।
बस 5% मतभेद और 95% अहंकार।
बाक़ी काम कर देता है-चुप्पी। वो चुप्पी जो दिनों को महीनों में,
और महीनों को सालों में बदल देती है।
भाई ने कुछ कहा, बहन को बुरा लग गया, अब दोनों एक-दूसरे से बात नहीं करते। पता ही नहीं चलता, कब त्योहार गुजर जाते हैं,और रिश्ता ठंडा होता जाता है।
पति ने ऑफिस से थककर कोई बात तीखे लहज़े में कह दी —
पत्नी ने सोच लिया, “अब मैं भी नहीं बोलूँगी।
”दिन बीतते हैं, एक ही घर में दोनों अजनबी से हो जाते हैं।
दो दोस्तों में किसी तीसरे ने कुछ कहा और सालों की दोस्ती खत्म हो जाती है। ना call ना message। बस एक “ego wall” बन जाती है।
यहाँ तक कि ऑफिस में भी —
बॉस ने डाँट दिया, हमने जवाब नहीं दिया, अब एक-दूसरे से मुँह फेरकर काम करते हैं। office में टेंशन रहती है।
धीरे-धीरे रिश्ता “हम” से “मैं” में बदल जाता है।
कभी जो लोग साथ हँसते थे, अब एक-दूसरे का नाम सुनकर खामोश हो जाते हैं। और फिर अंदर कहीं गहरी खामोशी बस जाती है —
वो जो दिल को खाती है, और रिश्तों को मुरझा देती है।
वाल्मीकि रामायण में भी एक ऐसा ही प्रसंग है।
जब भरत जी को पता चला कि राम जी को वनवास मिला है, तो वे दौड़े-दौड़े अयोध्या से चित्रकूट पहुँचे।
राजगद्दी उनके सामने थी, पर उन्होंने कहा-“भैया, मैं राज्य नहीं लूँगा।
मैं सिर्फ़ आपके चरणों में रहना चाहता हूँ।”
राम ने भी उन्हें गले लगा लिया।
ना आरोप मढ़ा, ना ताना दिया, ना अहंकार ही किया।
बस भाई को देख कर प्रेम उमड़ आया और क्षमा कर दिया।
केकेई की बुराई कर सकते थे, राज सिंहासन धोखे से छीन लेने की बात कह सकते थे, वनवास भेजने का तंज कस सकते थे-पर नहीं किया।
ego रिश्तों में आड़े नहीं आने दी।
वो रिश्ता एक पल में टूट सकता था। सदा के लिए बचा लिया।
कभी-कभी झगड़ा बड़ा नहीं होता, बस “मैं क्यों झुकूँ” वाला अहंकार बड़ा हो जाता है। रिश्ते इसलिए नहीं टूटते कि कोई गलत है, रिश्ते इसलिए टूटते हैं, क्योंकि कोई माफ़ करने को तैयार नहीं होता।
रामायण कहती है —
“जहाँ अहंकार है, वहाँ प्रेम नहीं टिकता।
जहाँ प्रेम है, वहाँ अहंकार टिक ही नहीं सकता।”
इसीलिए अभी फोन उठाइए,
किसी पुराने दोस्त को मैसेज कीजिए,
किसी रिश्तेदार से बात कीजिए, किसी से “सॉरी” कह दीजिए –
क्योंकि माफ़ी रिश्ते को छोटा नहीं करती, बल्कि रिश्तों को फिर से जोड़ देती है । आपको बड़ा बनाती है।
रिश्ते न तो झगड़े से टूटते हैं, न दूरी से।
रिश्ते तब टूटते हैं जब “मैं” “हम” से बड़ा हो जाता है।
और जहाँ “मैं” खत्म होता है, वहीं रामराज्य शुरू होता है-आपके अपने घर में।



