महाशिवरात्रि का महापर्व एक बार फिर हमारे आस्था के द्वार पर दस्तक देने को है।
कल्याण का देव महादेव (Mahadev)
इस दिन फिर से मंदिरों में जगमग-जगमग सहस्त्रों ज्योतियाँ जलेंगी। अनहद घंटों की ध्वनि गूँजेगी। शिवलिंगों पर जल अर्पित होगा। हर हर महादेव, ऊं नमः शिवाय आदि मंत्र गूंजने लगेंगे, इस तरह वातावरण ‘शिवमय’ होने लगेगा।
भोलेनाथ का यह महापर्व हमें केवल बाहरी ज्योतियाँ दिखाने, बाहरी घंटियाँ सुनाने या केवल बाहरी मंत्रों का उच्चारण मात्र व जलाभिषेक अर्पित करने के लिए नहीं आता; बल्कि हमें देवाधिदेव महादेव की शाश्वत ज्योति,अनहद नाद और भीतरी अमृत के अनुभव से जोड़ने आता है।
बाहरी मंदिर की पूजा ही नहीं, अंतर्जगत के अलौकिक मंदिर का साधक बनाने भी आता है। शिव की महिमा ‘मनाने’ ही नहीं; बल्कि शिवत्व को ‘जानने’ और उसमें स्थित तत्त्वज्ञान का बोध कराने भी आता है।
शिव का अर्थ है कल्याणकारी। शिव ने सृष्टि के कल्याण के लिए ही समुद्रमंथन से उत्पन्न विष को अपने कंठ में उतारा और नीलकंठ बन गए। शिव का जो कल्याण करने का भाव है, वही शिवत्व कहलाता है।
शिवोहम् का उद्घोष वही व्यक्ति कर सकता है, जो अपने भीतर इस शिवत्व को धारण कर लेता है। उसे अपने आचार-व्यवहार में उतार लेता है।
महाशिवरात्रि पर शिव की उपासना तभी सार्थक होती है, जब हम दूसरों के कल्याण के लिए विष पीने को तैयार रहें अर्थात दूसरे के कष्टों के निवारण व सहयोग के लिए तत्पर रहें, इसी तरह हम शिवतत्व प्राप्त कर सकते हैं और शिव के आशीर्वाद के हकदार बन सकते हैं।
तो फिर आइए हम सब मिलकर त्याग व कल्याण के पवित्र भाव के साथ महाशिवरात्रि के पर्व को मनाने का सार्थक प्रयास करते हैं,
हां थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन फिर भी कोशिश करते हैं, क्योंकि सही मायने में कल्याण व त्याग के भाव से ही तो ‘शिव’ प्रसन्न होंगे।।
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