मानसिक उपासना क्या है
शास्त्रों में पूजा को हजार गुना फलदाई बनाने के लिए एक उपाय बताया गया है, वह उपाय है मानस पूजा…
” कृत्वादो मानसी पूजाम ततः पूजां समाचरेत “
वस्तुतः भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, वे तो भाव के भूखे हैं, पुराणों में मानस पूजा का विशेष महत्व माना गया है। मानस पूजा में भक्त अपने इष्टदेव को मुक्ता- मणियों से मंडित कर स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान कर सकता है…स्वर्गलोक की गंगा से स्नान करा सकता है, कामधेनु गौ के दूध से पंचामृत बना सकता है , भावना से वायु रुपी धूप, अग्नि रुपी दीपक, तथा अमृतरूपी नैवेध्य भगवान को अर्पित कर सकता है, त्रिलोक की सम्पूर्ण वस्तु , सभी उपचार अपने आराध्य के चरणों में भावना से भक्त अर्पण करता हुआ है, अपने इष्ट की पवित्र व समर्पित भाव से सेवा कर सकता है, यही मानस पूजा का स्वरुप है!
मानसपूजा का महत्व
मानस पूजा में आराधक का जितना समय लगता है उतना भगवान के संपर्क में बीतता है, और तब तक संसार उससे दूर हटा रहता है। अपने आराध्य के लिए बढ़िया से बढ़िया दिव्य आसन, फूल सुगंध, आभूषण, की कल्पना करता है और इन्हें जुटाने को बिभिन्न लोकों में मन की दौड़ लगाता है। जिससे उसके आराध्य के लिए उत्तम साधन जुट जायें और भगवान की अद्भुत सेवा हो जाये. इससे उसे अपार संतोष और प्रसन्नता मिलती है।
इस तरह भगवद सेवा में साधक जितना भी समय लगाता है. उतना समय वह अपने अंतर्जगत में बिताता है। इस तरह मानस पूजा साधक को समाधि की ओर ले जाती है और समाधि का अनुभव भी कराती है। जैसे कोई प्रेमी साधक कान्ताभाव से अपने इष्ट देव की मानसी सेवा कर रहा है। बाहरी पूजा में इसके लिए बहुत दौडधूप करनी पड़ती है, आर्थिक परेशानी अलग खड़ी रहती है, जिससे आराध्य से मधुर सम्बन्ध गाढ़ा नहीं हो पाता, मानस पूजा में ये अड़चन नहीं आती. जीवन के सारे तनाव छू हो जाते हैं, तन-मन की व्याधियां दूर होकर साधक के अन्दर एक नयी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. ईश्वर से उसका तादाम्य स्थापित होने लगता है, और साधक को समरस कर देती है। अलोकिक अनुभूतिया होने लगती हैं. साधक और आराध्य एकाकार हो जाते हैं।


