स्त्री नरक का द्वार या मुक्ति का, जानें सत्य क्या है।
स्त्री से भागकर अथवा स्त्री से दूर जाकर कभी वास्तविक ब्रह्मचारी नहीं बना जा सकता। स्त्री नरक का द्वार नहीं, बल्कि मुक्ति का द्वार भी बन सकती है। नरक का द्वार वह केवल उसके लिए है जो स्त्री के प्रति आसक्ति, वासना और मोह में बंधा हुआ है; किंतु जो स्त्री को देवी-स्वरूप, शक्ति-स्वरूप और सम्मान की दृष्टि से देखता है, उसके लिए वही शक्ति मुक्ति का मार्ग बन जाती है।
ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ केवल स्त्री से दूरी बनाना नहीं है। “ब्रह्म” के आचरण में स्थित होना ही ब्रह्मचर्य है। जब मनुष्य की चेतना इंद्रिय-सुखों से ऊपर उठकर सत्य, साधना और आत्मबोध की दिशा में चलने लगती है, तभी वह वास्तविक अर्थों में ब्रह्मचारी कहलाता है।
जब भोगने योग्य पदार्थ की उपस्थिति में भी वासना उदित न हो, जब भोग भी वासना-रहित हो जाए, तब वैराग्य की स्थिति समझनी चाहिए। ब्रह्मचर्य उसी अवस्था का नाम है।”
वीर्य का रक्षण तथा उसका ऊर्ध्वगमन ब्रह्मचर्य की प्रथम अवस्था मानी गई है, किंतु यह किसी प्रकार के दमन, भय या जबरदस्ती का परिणाम नहीं होना चाहिए। वास्तविक ब्रह्मचर्य साधना की परिपक्वता से स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है।
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जब चेतना इंद्रिय-विषयों, वासनाओं और भोगों के आकर्षण में बंधी रहती है, तब जीवन-ऊर्जा अधोमुखी होकर नीचे की ओर प्रवाहित होती है। तांत्रिक और योगिक दृष्टि में इसे अधोगति कहा गया है। यह केवल शारीरिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि चेतना की दिशा का भी संकेत है।
परंतु जैसे-जैसे साधक की साधना गहन होती जाती है, मन स्थिर होने लगता है, वासनाएँ क्षीण होने लगती हैं और प्राणशक्ति भीतर केंद्रित होने लगती है। तब वही ऊर्जा, जो पहले इंद्रिय-सुखों में व्यय होती थी, धीरे-धीरे ऊर्ध्व दिशा में प्रवाहित होने लगती है। यही ऊर्ध्वगमन ब्रह्मचर्य का वास्तविक प्रारंभ माना गया है।
इस अवस्था में ब्रह्मचर्य केवल बाहरी संयम नहीं रह जाता, बल्कि चेतना की एक उच्च अवस्था बन जाता है — जहाँ भोग उपस्थित होने पर भी भीतर आसक्ति या तृष्णा उत्पन्न नहीं होती। वहाँ त्याग का अहंकार भी नहीं रहता और भोग की लालसा भी नहीं रहती। साधक सहज, संतुलित और साक्षीभाव में स्थित हो जाता है।
तब स्त्री भी केवल देह नहीं रह जाती, बल्कि शक्ति का प्रतीक बन जाती है। दृष्टि बदलते ही संसार का स्वरूप बदलने लगता है। जहाँ वासना होती है वहाँ बंधन उत्पन्न होता है, और जहाँ श्रद्धा, सम्मान तथा साक्षीभाव होता है, वहीं से मुक्ति का द्वार खुलता है।
सच्चा ब्रह्मचर्य repression (दमन) नहीं, बल्कि transformation (रूपांतरण) है — काम-ऊर्जा का चेतना में रूपांतरण, वासना का वैराग्य में रूपांतरण, और भोग की प्रवृत्ति का आत्मबोध में विलय।
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