आज हम इस लेख में जैन गुरु श्रेष्ठ संत श्री रामानुजाचार्य जी का जीवन परिचय आपसे साझा कर रहे, कई लेख और कई जानकारियों के आधार स्वरुप हमने यह लेख तैयार किया है जिसका उल्लेख कई किताबों और ग्रंथों में भी साझा है उसी का संषिप्त वर्णन है तो आइये स्मरण करें।
श्री रामानुजाचार्य जी का जीवन परिचय (Shri Ramanujacharya ji)
दक्षिण भारत के तेरूँकुदर नामक क्षेत्रमें श्री रामानुजाचार्य जी का जन्म हुआ था। इनके बाल्यकाल में ही इनके पिता श्री केशव भट्टका परलोकवास हो गया। काञ्ची जाकर यादव प्रकाश जी से इन्होंने वेदाध्ययन आरम्भ किया; किंतु गुरु-शिष्यमें पट नहीं सकी। श्रीरामानुजाचार्य बचपनसे इतने प्रतिभाशाली थे कि श्री यादव प्रकाश जी जो भूल करते थे, उसे भी वे बता देते थे।
इससे चिढ़कर यादव प्रकाश ने इन्हें मरवा डालने का प्रयत्न किया; किंतु भगवान् की कृपासे इनकी प्राण-रक्षा हो गयी। श्री यामुनाचार्यजी ने अपने अन्तिम समयमें श्री रामानुजाचार्य का स्मरण किया; किंतु जब श्रीरामानुज श्रीरङ्गम् पहुँचे तो आलवन्दार (श्रीयामुनाचार्य) शरीर छोड़ चुके थे। उनके हाथकी तीन अंगुलियाँ मुड़ी हुई थीं।
श्रीरामानुजने ब्रह्मसूत्र, विष्णुसहस्त्रनाम और दिव्यप्रबन्धम्की टीका लिखनेकी वहीं प्रतिज्ञा की। उनके प्रतिज्ञा करते ही मुड़ी हुई अंगुलियाँ सीधी हो गयीं। इसके बाद श्रीरामानुजने श्रीपेरिय निम्बसे विधिपूर्वक वैष्णव-दीक्षा ली। आचार्य श्रीरामानुजजी गृहस्थ थे; किंतु गृहस्थीमें रहकर भगवद्भक्तिके प्रचारमें बाधा पड़ती देख आपने श्रीरङ्गम् जाकर यतिराजसे संन्यास-दीक्षा ले ली।
ज्यों-ज्यों श्रीरामानुजजीका यश बढ़ता गया, उनके शत्रु भी बढ़ते गये। उनको मारनेका कई बार शत्रुओंने प्रयत्न किया। चोल देशके राजा कुलोत्तुंगने इन्हें अपने यहाँ बुलवाया। वह वैष्णवोंका घोर शत्रु था और आचार्यको बुलवाकर मार डालना चाहता था।
आचार्यके बदले उनके मुख्य शिष्य कूरेशजी जब उसके यहाँ गये तब उस क्रूर राजाने उनकी आँखें निकलवा लीं। आचार्य श्रीरामानुजजी श्रीरङ्गम्से मैसूर राज्यके शालग्राममें रहने लगे थे। वहाँसे वे श्रीरङ्गम् तब आये जब उस क्रूर राजाकी मृत्यु हो चुकी थी।
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उनके चौहत्तर शिष्य थे, जो सब के सब महात्मा हुए हैं। एक सौ बीस वर्षकी अवस्थामें आचार्यने इस लोकका त्याग किया। श्रीरामानुजाचार्यजीका सिद्धान्त विशिष्टाद्वैत कहा जाता है। इस मतकी परम गुरु भगवती श्रीलक्ष्मीजी हैं। इस मतके अनुसार भगवान् पुरुषोत्तम ही त्रिभुवनके स्वामी हैं। वे प्रत्येक शरीरमें साक्षीरूपसे विद्यमान हैं। सभी जीव उनके सेवक हैं।
भगवान् की शरण हो जाना ही जीवके कल्याणका एकमात्र उपाय है। मन, वाणी तथा शरीरसे भगवान् नारायणकी सेवा करना ही जीवका परम कर्तव्य है।
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