आज हम इस लेख में जैन गुरु श्रेष्ठ संत श्री निम्बार्काचार्य जी का जीवन परिचय आपसे साझा कर रहे, कई लेख और कई जानकारियों के आधार स्वरुप हमने यह लेख तैयार किया है जिसका उल्लेख कई किताबों और ग्रंथों में भी साझा है उसी का संषिप्त वर्णन है तो आइये स्मरण करें।
श्री निम्बार्काचार्य जी का जीवन परिचय (Shri Nimbakacharya ji)
श्री निम्बार्काचार्य जी का प्रामाणिक जीवन चरित प्राप्त नहीं होता। कहा जाता है कि उनका जन्म गोदावरी के तटपर वदूर्यपत्तन में हुआ था। कोई इनके पिता का नाम श्री अरुण मुनि और माता का नाम श्री जयन्ती देवी मानते हैं और कोई इनके पिता का नाम श्री जगन्नाथ मानते हैं। ये सूर्य या भगवान् के सुदर्शन चक्र के अवतार कहे जाते हैं।
श्री निम्बार्काचार्य के मतको द्वैताद्वैत मत कहा जाता है। इसके आदि आचार्य सनकादि कुमार माने जाते हैं। इसलिये इसे सनकादि सम्प्रदाय कहते हैं।
श्री निम्बार्काचार्य जी का पहले नियमानन्द नाम था। ये दक्षिण भारत से व्रज आ गये थे और यमुना-तटपर ध्रुवक्षेत्र में रहने लगे थे। वहाँ एक बार एक साधु इनके पास आये। दोनों महात्माओं में भगवत्-चर्चा होने लगी, इसी में सूर्यास्त हो गया। आये हुए साधु रात्रि में भोजन नहीं करते थे। अपने यहाँ आये अतिथि उपवास करें, यह बात श्री नियमानन्द जी को पसंद नहीं थी।
उन्होंने अपनी भक्ति के प्रभाव से पास के नीम के पेड़ पर सूर्य को प्रकाशित होते दिखा दिया। अतिथि ने भोजन कर लिया। इस घटना के कारण ही श्री नियमानन्द जी का नाम श्री निम्बार्काचार्य पड़ गया।
श्री निम्बार्काचार्य जी ने कई ग्रन्थ लिखे हैं। उनके सम्प्रदाय में बहुत-से विरक्त महात्मा एवं विद्वान् हुए हैं। इस सम्प्रदाय के लोग श्री राधाकृष्ण की उपासना करते हैं और गोपीचन्दन का तिलक लगाते हैं। निम्बार्क सम्प्रदाय का मुख्य प्रमाण-ग्रन्थ श्रीमद्भागवत माना जाता है।
निम्बार्क सम्प्रदाय के अनुसार परम ब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं। जीव अनन्त हैं और उनका अन्तिम लक्ष्य श्रीकृष्णचन्द्र का सांनिध्य प्राप्त करना ही है। भक्तिके द्वारा ही जीव इस जन्म-मरणके बन्धनसे छूट सकता है।
निम्बार्क सम्प्रदाय के संत अत्यन्त त्यागी, एकान्त सेवी और भजन निष्ठ हुए हैं। सांसारिक सुख-भोगसे दूर रहकर भगवान् की उपासना ही इस सम्प्रदाय की मुख्य शिक्षा है। ‘भगवान् का रूप, भगवान् का नाम, भगवान् की लीला और भगवान् का धाम -ये चारों ही दिव्य एवं पावनकारी हैं। भगवान् के रूप तथा उनकी लीलाओं का ध्यान करना चाहिये।
भगवान् के नाम का जप एवं उनकी लीलाओं का गायन परम मंगलमय है। व्रज भूमि का निवास बड़े भाग्य से प्राप्त होता है। व्रज भूमि स्वतः परमपावन है। वहाँ का प्रत्येक कण जीव को पवित्र करने वाला है।’ यह निम्बार्क सम्प्रदाय के संतों का दृढ़ भाव रहा है।
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