भगवान और देवताओ में क्या अंतर है?

समस्त देवी-देवता भौतिक दृष्टि के प्रशासन- कार्य के लिये भगवान द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। जीवों द्वारा जीवन यापन करने के लिये अनिवार्य वस्तुएं तथा वायु, प्रकाश, जल तथा अन्य प्राकृतिक सुविधायें उपलब्ध करवाने के लिए ये समस्त देवी-देवता भगवान श्रीकृष्ण के असंख्य प्रतिनिधि हैं। समस्त देवी-देवता भगवान श्रीकृष्ण के सेवक हैं। सूर्य, चंद्र, वायु, वरुण तथा बृहस्पति इत्यादि 33 कोटी देवी-देवता हैं।

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उनके भिन्न भिन्न लोक हैं। परन्तु वे सभी कृष्ण के सेवक हैं। कृष्ण ही आदि हैं। “आद्यम पुराणपुरुषम्” (ब्रह्म संहिता) अर्थात् कृष्ण सबसे पुरातन या सबके मूल हैं। भगवद्गीता में कहा गया है- “अहं सर्वस्य प्रभवो” (भगवद्गीता 10.8)। अन्य सभी अवतार हैं। कृष्ण स्वयं अवतारी हैं अर्थात् समस्त अवतारों के मूल स्रोत हैं। समुद्र या नदी की लहरों के प्रवाह के समान निरंतर अनंत अवतार प्रकट होते रहते हैं, परन्तु कृष्ण तो आदि पुरुष हैं। अतः कृष्ण इसकी पुष्टि करते हैं।

अहं सर्वस्य प्रभवो मतः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ।।

(भगवद्गीता 10.8)

समस्त अवतार मुझसे ही प्रकट होते हैं। अतः यदि हम केवल श्रीकृष्ण की ही उपासना करते हैं, तो अन्य समस्त देवी-देवताओं की उपासना स्वतः ही हो जाती है। और कृष्ण भी यह मांग करते हैं। “मामेकं शरणं व्रज” अर्थात् “मेरी शरण में आ जाओ”

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं- “अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः”

अर्थात् “मैं देवताओं और महान ऋषियों का भी आदि कारण हूँ”।

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