दिव्य स्तुति संग्रह | प्रभु के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण | Divya Stuti Sangrah

दिव्य स्तुति संग्रह प्रभु के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण Divya Stuti Sangrah

यह प्रार्थना साधक के हृदय में भक्ति का संचार करने वाली और प्रभु के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण कराने वाली है।

1. भगवन्नाम संकीर्तन (विष्णु-स्मरण) :

“हे रामा ! पुरुषोत्तमा ! नरहरे ! नारायणा! केशवा ! गोविन्दा ! गरुडध्वजा ! गुणनिधे ! दामोदरा ! माधवा ! हे कृष्णा ! कमलापते ! यदुपते ! सीतापते ! श्रीपते ! वैकुण्ठाधिपते ! चराचरपते ! लक्ष्मीपते ! पाहि माम्॥”

भावार्थ: हे मर्यादा पुरुषोत्तम राम ! हे पुरुषों में उत्तम, नृसिंह भगवान, नारायण और केशव ! हे गरुड़ पर विराजमान, गुणों के भंडार, दामोदर और माधव ! हे भक्तवत्सल कृष्ण, माँ लक्ष्मी के स्वामी, यदुवंश के रक्षक, माता सीता के प्राणप्रिय और वैकुण्ठ के अधिपति ! आप समस्त चर-अचर जगत के स्वामी हैं, मुझ शरणागत की रक्षा करें।

2. शरणागति प्रार्थना :

“हे गोपालक ! हे कृपाजलनिधे ! हे सिन्धुकन्यापते !
हे कंसान्तक ! हे गजेन्द्र करुण! पाहि नो हे माधव।
हे रामानुज ! हे जगत्त्रयगुरो ! हे पुण्डरीकाक्षमाम् !
हे गोपीजन ! नाथ पालय परं जानामि न त्वां विना॥”

भावार्थ: हे गौओं के पालक, कृपा के सागर और समुद्रपुत्री
लक्ष्मी के स्वामी! कंस का अंत करने वाले और गजेन्द्र पर करुणा करने वाले माधव, हमारी रक्षा करें। हे लक्ष्मण के अग्रज (या राम के अनुज कृष्ण), तीनों लोकों के गुरु, कमल नयन प्रभु! आप ही गोपियों के रक्षक हैं, मेरा पालन करें। आपके अतिरिक्त मैं किसी अन्य को नहीं जानता।

3. श्री कृष्ण स्वरूप वर्णन (कृष्ण-ध्यान) :

“कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं, नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुः करे कंकणम्। सर्वांगे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावली, गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥”

भावार्थ: जिनके माथे पर कस्तूरी का तिलक है, वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि चमक रही है, नासिका के अग्रभाग में सुंदर मोती है, और हाथों में मुरली तथा कंगन सुशोभित हैं। जिनका संपूर्ण शरीर सुगंधित चंदन से लेपित है और गले में मोतियों की माला है। जो गोपियों से घिरे हुए हैं, ऐसे गोपालों के शिरोमणि श्री कृष्ण की जय हो।

4. एकश्लोकी रामायण (राम-कथा सार) :

“आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं काञ्चनं, वैदेही हरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम्। बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनं, पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननमेतद्धि रामायणम्॥”

भावार्थ: पहले श्री राम का वनवास जाना, स्वर्ण मृग का वध, माता सीता का हरण, जटायु का मोक्ष, सुग्रीव से मित्रता, बाली का वध, समुद्र लांघना, लंका दहन और अंत में रावण तथा कुम्भकर्ण का संहार- यही संपूर्ण रामायण का सार है।

5. एकश्लोकी भागवत (कृष्ण-लीला सार) :

“आदौ देवकिदेव गर्भजननं गोपीगृहे वर्धनं, माया पूतन जीव ताप हरणं गोवर्धनोद्धारणम्। कंसच्छेदन कौरवादि हननं कुन्तीसुतान् पालनम्, श्रीमद् भागवतं पुराण कथितं श्रीकृष्णलीलामृतम्॥”

भावार्थ: देवकी के गर्भ से जन्म लेना, गोपियों (यशोदा) के घर बढ़ना, पूतना जैसी मायावी राक्षसी के प्राण हरना, गोवर्धन पर्वत को उठाना, कंस का वध, कौरवों का विनाश और पांडवों (कुन्ती पुत्रों) की रक्षा- यही श्रीमद्भागवत पुराण द्वारा वर्णित श्रीकृष्ण लीला है।

6. महापुरुष एवं तीर्थ वंदना :

“श्रीरंगं कुलमज्जितगिरौ शेषाचलद्रि सिंहासनम्, श्रीकुर्म पुरुषोत्तमञ्च बदरी नारायणं नरहरीम्। श्रीमद्वारावती प्रयागो मथुरा अयोध्या गया पुष्करम्, शालिग्राम निवासने विजयते रामानुजोऽयं मुनिः॥”

भावार्थ: श्रीरंगम, वेंकटाद्रि (शेषाचल), श्रीकूर्मम, जगन्नाथ पुरी (पुरुषोत्तम), बद्रीनाथ और अहबिलम (नरहरि) जैसे दिव्य स्थानों, तथा द्वारका, प्रयाग, मथुरा, अयोध्या, गया और पुष्कर जैसे पवित्र तीर्थों में वास करने वाले प्रभु की महिमा और शालिग्राम में निवास करने वाले भगवान श्री रामानुजाचार्य मुनि की जय हो।

भक्ति की इस गंगा को अपने मित्रों और परिवार के साथ भी साझा करें!


भगवानम डॉट कॉम पर हमने आपके लिए कुछ नए भाग भी जोडें है जिससे आपको और भी अन्य जानकारियां प्राप्त होती रहे जैसे | पौराणिक कथाएं | भजन संध्या | आरती संग्रह | व्रत कथाएं | चालीसा संग्रह | मंत्र संग्रह | मंदिर संग्रह | ब्लॉग | इन्हें भी पढ़ें और अपने विचार हमें कमेंट में बताये जिससे हम समय पर अपडेट करते रहे। हमसे जुड़ने के लिए फॉलो करें यू ट्यूब चेनल, इन्स्टाग्राम और फेसबुक से।

Leave a Comment

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Scroll to Top