एक्सपेंडेड डेट ऑफ़ डिलीवरी (EDD) और ज्योतिष शास्त्र का संबंध जानें क्यों ?

आज कम कुछ लोग जो की ज्योतिष को मानते है हिन्दू धर्म में वे चाहते है हमारे बच्चे का जन्म अच्छे और उत्तम नक्षत्र, या दिन के हिसाब से हो लेकिन वो ये नहीं समझते “आप करे सो कुछ न होए प्रभु करे सो होए” इसी बात को (एक्सपेंडेड डेट ऑफ़ डिलीवरी) विस्तार से इस कहानी में हम समझा रहे है।

एक्सपेंडेड डेट ऑफ़ डिलीवरी (EDD) और ज्योतिष शास्त्र का संबंध जानें क्यों ?

नवजात शिशु के जन्म की जो एक्सपेक्टेड डेट ऑफ़ डिलीवरी (EDD) जब डॉक्टर बता देता है तब लोग उसी के हफ़्ते दस पंद्रह दिन की रेंज में सीजेरियन का मुहूर्त पूछने आते हैं।

हम उनको स्पष्ट बताना चाहते हैं कि चंद्रमा की राशि और नक्षत्र ही चुने जा सकते हैं। और जब समय एकदम नजदीक का हो तो कई बार चंद्र राशि व नक्षत्र चुनना भी मुश्किल हो जाता है, उस समय केवल लग्न का ही चुनाव किया जा सकता है।

ग्रहों में से शायद ही एक दो राशि बदलने वाले हों अगले दस दिन में। सूर्य 15 तारीख़ के आसपास राशि बदलता है। शुक्र, बुध भी बदल सकते हैं। लेकिन शनि, राहु, केतु, गुरु तो राशि बदलने में साल, डेढ़ साल, तीन साल लगा देते हैं तो उनको दस दिन में क्या फ़र्क़ पड़ना है। और ऊपर से वह उच्च के या स्वग्रही भी हों यह तो और भी दूर की कौड़ी है। अर्थात कहने का मतलब है ग्रह काफी दिनों तक एक राशि में विद्यमान रहते हैं उदाहरण के तौर पर वर्तमान में मंगल ग्रह नीच राशि में चल रहे हैं अतः वह अपनी नीच राशि में ही रहेंगे, उसको चेंज करना संभव नहीं होता। बस इतना प्रयास किया जा सकता है कि ऐसी लग्न का चुनाव किया जाए की मंगल ग्रह 12 भावों में से ऐसे भाव में चले जाएं जिससे कि वह ज्यादा परेशान ना कर सके। वर्तमान में शनि ग्रह अपनी स्वयं की राशि कुंभ में गोचर कर रहे हैं। अब यह शनि ग्रह के लिए गोचर स्थिति शुभ है अतः शनि ग्रह जहां शुभ होते हैं उन भाव में शनि ग्रह को लाया जाए तो यह और भी ज्यादा अच्छे व शुभ परिणाम दे सकते हैं।

कुल मिला कर कहा जा सकता है कि ग्रह की राशि ज्यादातर मामलों में नहीं बदलती है। सिर्फ़ लग्न तय कर सकते हैं जो 24 घंटे में दो दो घंटे में आती हैं। वहाँ पर भी डॉक्टर हो सकता है रात के समय डिलीवरी से मना कर दे। तो फिर मुश्किल से एक दो लग्न ठीक ठाक बचती हैं जिनका मुहूर्त निकाला जाता है।

दिन तय करके जन्म नक्षत्र तय होता है जिससे स्टार्टिंग महादशा तय होती है । उसमें शनि, केतु, राहु महादशा किसी को नहीं चाहिए। लेकिन यह हर 9 दिन में रिपीट होने ही हैं।

कहने का मतलब यह है कि मुहूर्त एक ऐसी चादर होती है जिसे एक तरफ़ से खींचो तो दूसरी तरफ़ खुल जाती है। अगर आपने अच्छे ग्रहों की दशा शुरू में लगा दी, तो बुरे वाले ठीक उसके बाद में आएँगे क्योंकि ग्रहों का दशा क्रम तो निश्चित है। गुरु महादशा से शुरू करोगे तो उसके बाद शनि आ जाएगा। बुध से शुरू करोगे तो केतु आ जाएगा। चंद्रमा से करोगे तो मंगल और मंगल से करोगे तो राहु आ जाएगा।

उसके बाद ग्रहों के जो योग बनते हैं, उनका सिर्फ़ आप यही कर सकते हो कि उनको अच्छे से भाव में बैठा दिया जाए। लेकिन अगर लगातार राशियों में एक एक ग्रह हैं, तो उनमें से एक अगर अच्छे में रखो तो दूसरा अपने आप ख़राब भाव में चला जाएगा।

लेकिन फिर भी प्रयास करके एक उचित मुहूर्त निकाला जा सकता है। एक सप्ताह के अंतराल में राशि नक्षत्र व लग्न का चुनाव ठीक-ठाक किया जा सकता है और यदि डॉक्टर दो-चार दिन का समय देता है तो नक्षत्र को ठीक किया जा सकता है और डॉक्टर केवल एक या दो दिन का समय देता है तो लग्न को ठीक-ठाक किया जा सकता है।

जन्म लग्न कुंडली में लग्न, चंद्र राशि व नक्षत्र तीनों ही महत्वपूर्ण होते हैं। और जब डॉक्टर द्वारा सिजेरियन डिलीवरी में एक सप्ताह का समय दिया जाता है तो इनमें कुछ हद तक सही नक्षत्र, राशि व लग्न का चुनाव करना संभव हो जाता है।

डिलीवरी के लिए ज्योतिष शास्त्र का सहयोग लिया जा सकता है, लेकिन प्राथमिकता डॉक्टर को देनी चाहिए, यदि डॉक्टर इसकी अनुमति देता है तो ही आप आगे बढ़े।

ज्योतिष शास्त्र इसके लिए केवल प्रयास कर सकता हैं अंतिम इच्छा ईश्वर की है। हमारा दायित्व केवल सही दिशा में कर्म करना है बाकी अंतिम इच्छा ईश्वर की ही मान्य है।

(नोट-: ध्यान रहे सिजेरियन डिलीवरी में किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहिए, डॉक्टर परामर्श सर्वप्रथम मानना चाहिए। मुहूर्त की जिद में किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहिए क्योंकि ईश्वर इच्छा वही है जिस समय बच्चा जन्म लेता है/ और यदि आपका डॉक्टर अनुमति दे तो फिर एक अच्छा लग्न मुहूर्त अवश्य लेना चाहिए।)


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