आज जब शिवरात्रि आती है, संसार में शिव का गुणगान शुरू हो जाता है। कहीं कथा, कहीं भजन, कहीं प्रवचन — हर ओर शिव की महिमा सुनाई देती है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या शिव केवल उत्सव हैं? क्या शिव केवल जलाभिषेक व विल्वपत्र इत्यादि चढ़ाने तक सीमित है?
क्या शिव केवल एक दिवस का भाव हैं? या शिव जीवन के गहरे तत्व का संकेत हैं..?
शिव को समझने से पहले यह समझना जरूरी है कि महिमा और तत्व अलग हैं।
महिमा शब्दों से बनती है, कथा से बनती है, भावनाओं से बनती है।
लेकिन तत्व अनुभव से जन्म लेता है।
जो केवल शिव की कहानी सुनता है, वह भक्त हो सकता है;
लेकिन जो शिव के तत्व को जीता है, वही साधक बनता है।
त्योहारों का उद्देश्य कभी भीड़ बनाना नहीं था।
उनका उद्देश्य था — मनुष्य को रुकने का अवसर देना, भीतर देखने की याद दिलाना।
लेकिन समय के साथ त्योहार उत्साह का माध्यम बन गए, और तत्व पीछे छूट गया।
आज शिवरात्रि आती है तो शिव की जय-जयकार होती है,
कल किसी और का जन्मोत्सव या विवाहोत्सव होगा — और वही क्रम चलता रहेगा।
यदि धर्म केवल दिवसों में सिमट जाए, तो वह जीवन का सत्य नहीं रह जाता, परंपरा का ढांचा बन जाता है।
शिवतत्व ? शिव का अर्थ केवल देवता नहीं है।
शिव शून्यता हैं — जहाँ अहंकार समाप्त होता है।
शिव संहार हैं — जहाँ झूठ टूटता है।
शिव मौन हैं — जहाँ विचार शांत हो जाते हैं।
इसलिए शिव को समझना आसान नहीं, क्योंकि शिव इच्छा पूरी करने का प्रतीक नहीं, बल्कि इच्छा के अंत का मार्ग हैं।
शिव को मोक्ष और संहार का देव क्यों कहा गया?
क्योंकि शिव जीवन के उस सत्य की ओर ले जाते हैं जहाँ पुराने “मैं” का अंत होता है।
श्मशान में रहने वाले शिव मृत्यु से भागते नहीं, उसे स्वीकार करते हैं।
विष पीने वाले शिव दुख से डरते नहीं, उसे जीवन का हिस्सा मानते हैं।
तांडव करने वाले शिव परिवर्तन को रोकते नहीं, उसे अपनाते हैं।
लेकिन मनुष्य अक्सर पूजा इसलिए करता है कि उसे आश्वासन मिले,
इच्छाएँ पूरी हों, सपने पूरे हों।
शिव का मार्ग इसके विपरीत है — शिव भीतर के भ्रम को तोड़ते हैं।
रावण भी शिव का भक्त था।
शिव ने उसे शक्ति दी, क्योंकि शिव पक्षपाती नहीं हैं।
ऊर्जा सबको मिलती है —
अहंकार में उपयोग करो तो रावण बनता है,
जागरूकता में उपयोग करो तो राम बनता है।
आज धर्म कई जगह व्यापार जैसा दिखने लगता है, क्योंकि ज्ञान बिकने लगा है और भीड़ ही प्रमाण बन गई है।
लेकिन सच्चा धर्म किसी संस्था का नाम नहीं — वह जीवन का अनुभव है।
जब धर्म जीवित होता है, तब वह नियम नहीं बनाता;
वह मनुष्य को स्वयं देखने की क्षमता देता है।
शिवराज का अर्थ है — शिव का राज्य, यानी भीतर का शासन।
जहाँ मन नहीं, मौन मार्गदर्शक बनता है।
जहाँ केवल पूजा नहीं, जागरूकता साधना बनती है।
जहाँ महिमा नहीं, अनुभव सत्य बनता है।
यदि शिव को समझना है, तो परंपराओं से आगे बढ़ना होगा।
कथाओं से आगे, भीड़ से आगे –
अपने भीतर उस स्थान तक पहुँचना होगा जहाँ संहार भी है और मुक्ति भी।
वहीं से शिव का वास्तविक मार्ग शुरू होता है…।।
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