हम किसी मंत्र का जाप या भगवन नाम जाप जितनी ऊर्जा , भावना , और निष्ठा से करते हैं , उतनी ही शक्ति हम अपने भीतर इकट्ठा कर पाते हैं , उतना ही संचय हमारे भीतर होता है!
जैसे हम अपने बैंक में बिना पैसा जमा किए हम उसे निकाल नहीं सकते ठीक वैसे ही साधना में श्रद्धा, अनुशासन, और शुद्धता के बिना सिद्धि की अपेक्षा नहीं की जा सकती !
शरीर और मन की शुद्धता ही वह पात्रता है जो मंत्र की ऊर्जा को धारण करने योग्य बनाती है ! जिसका भोजन शुद्ध- सात्विक हो, दैनिक दिनचर्या संयमित हो, मन थोड़ा नियंत्रित हो, उसका जाप फलदायी होता है !
क्योंकि तब साधक के भीतर की वाइब्रेशन और मंत्र की वाइब्रेशन में एकरस हो जाता है और महत्वपूर्ण बात साधना में रस का ही फल मिलता है आप मंत्रजाप से जितना रस निकालेंगे वो ही आपकी साधना को ऊर्जा देता है !
इसीलिए मंत्र जाप में वाक् का विशेष महत्व होता आया है !! मंत्र जाप करते समय इतना खो जाना चाहिए कि अपनी सुध बुध ही न रहे और बाहर की आवाज सुनाई ही न दें बस अपने मंत्र व नाम जप की ध्वनि सुनाई दें !!
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