संत श्री एकनाथ जी की कांवड यात्रा कैसे पूरी हुई ?

संत श्री एकनाथ जी की कांवड यात्रा कैसे पूरी हुई

स्वागत है आपका आज हमारी एक और नयी प्रेरक कहानी “संत श्री एकनाथ जी की कांवड यात्रा” आज हम आपको बताते है कांवड़ यात्रा और श्रावण में इसका महत्व क्यों है इसी बारे में कुछ विशेष बाते तो पढ़िए और आनंद लीजिये।

संत श्री एकनाथ जी के जीवन की एक कथा आती है कि वे एक समय अपने कुछ शिष्यों के साथ गंगोत्री से काँवर पर जल लेकर श्री रामेश्वरम् चढ़ाने के लिये जा रहे थे।

रामेश्वरम पहुँचने ही वाले थे कि मार्ग में जब एक जगह उन्होंने देखा कि एक गधा गड्ढे में पड़ा प्यास के कारण पानी के बिना तड़प रहा है, उसे देखकर उन्हें दया आ गयी और अपने एक शिष्य को जल देने को कहा, शिष्य बोले गुरुजी जल तो सब समाप्त हो गया पीछे कंही और मिला भी नही जो पुनः भर लेते।

संत एकनाथ जी ने कहा अरे भाई ये गधा बिना जल के प्राण त्याग देगा इसे कंही से भी जल पिलवाओ, आस पास कंही जल की कोई व्यवस्था नही थी।

एकनाथ जी ने कहा जो कांवर में जल है वो इस गधे को पिला दो, इस बात पर शिष्य बोले महाराज कैसी बात कर रहे हैं आप दो महीने हो गए कंधे पे जल ढोते-ढोते भूख-प्यास से हमारी भी हालत खराब है, अब रामेश्वरम समीप है हमें भगवान शिव का जलाभिषेक करना है।

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एकनाथ जी ने कहा भगवान शिव का जलाभिषेक तो फिर हो जाएगा लेकिन अगर अभी इस गधे को जल नही मिला तो ये प्राण त्याग देगा।

किन्तु कोई शिष्य अपना जल देने को तैयार नही हुआ..अंत मे एकनाथ जी ने कहा लाओ मेरी कांवर से जल निकाल के लाओ और एकनाथ जी ने जैसे ही कांवर का गंगाजल गधे के मुँह में डाला गधे में से स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गए।

और एकनाथ जी को कहा एकनाथ जी अब आपको रामेश्वरम आने की आवश्यकता नही रामेश्वरम ने स्वयं आपका यहीं जल और जलाभिषेक स्वीकार कर लिया.


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