कभी-कभी जीवन में सबसे बड़ा दुःख यह नहीं होता कि दुश्मन चोट पहुँचाता है । सबसे बड़ा दर्द तब होता है, जब वही लोग ज़हर बन जाएँ, जिन्हें हम दिल का सबसे करीबी समझते थे।
घर एक-सा, खून एक-सा…
फिर भी बात-बात पर ताना,, सम्मान की जगह अपमान, स्नेह की जगह ईर्ष्या और हर कदम पर आपको छोटा दिखाने की कोशिश।
आप बार-बार समझाते हो —
“सुधर जाओ, रिश्ते बचा लो…”पर सामने वाला हर बार और कठोर हो जाता है।
दिल रोता है —“क्या इन्हें छोड़ना विश्वासघात होगा?”
यही तो आज की सबसे बड़ी उलझन है…
*ऐसा ही एक दिन था लंका में-
विभीषण भी दिल से अपने भाई को चाहता था। राजमहल, वैभव, साम्राज्य — सब कुछ था उसके पास, पर दिल-धर्म और सत्य के साथ था। रावण का अहंकार बढ़ता गया।
विभीषण ने विनती की —“भैया, सत्य का मार्ग अपनाओ, अधर्म करना छोड़ दो, शक्ति वहीं टिकती है, जहाँ न्याय हो।”
पर जवाब में मिला- अपमान।धक्का।निकाल दिया गया।
घर था पर रहने लायक नहीं था । रिश्ता था, पर सम्मान गायब था ।खून का रिश्ता था। पर इंसानियत नहीं थी ।
उस पल विभीषण टूटे नहीं —संभले।
उन्होंने खुद से कहा —“जहाँ स्नेह खत्म हो जाए और अन्याय घर कर ले, वहाँ रुकना धर्म नहीं… विनाश है।”
और वह चल पड़े —
अकेले… भारी मन से… आँसू दबाकर…
पर सत्य की ओर, प्रभु की ओर।
और फिर क्या हुआ?
जिसे अपने घर से निकाला गया, उसे राम ने गले लगाया।
जिसे भाई ने पराया किया, उसे धर्म ने अपना लिया।
जिसे महल छोड़ना पड़ा, उसे समूचे लंका का राज मिला।
क्यों? क्योंकि उसने दर्द सहकर भी, सही रास्ता चुना।
इसलिए जहाँ सम्मान न मिले, जहाँ रिश्ते दिल को ज़हर देने लगें, वहाँ रहना त्याग नहीं — मूर्खता है।
Toxic रिश्ते त्यागना ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़ना नहीं, बल्कि स्वाभिमान की रक्षा है।
यदि आज आप भी इस दौर से गुजर रहे हैं…
तो याद रखिए —
कभी-कभी आपको छोड़ना नहीं,छूट जाना पड़ता है- उन हाथों से जो आपकी कद्र करना भूल चुके हों।
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