क्या कभी आपने सोचा है कि हिमालय जैसी अडिग सत्यनिष्ठा वाला व्यक्ति जब एक छोटा सा ‘तकनीकी’ झूठ बोलता है, तो ब्रह्मांड के नियम कैसे बदल जाते हैं? कुरुक्षेत्र की उस धूल भरी शाम को केवल एक गुरु का वध नहीं हुआ था, बल्कि सत्य की उस दिव्य ऊँचाई का भी पतन हुआ था जो मनुष्य को देवताओं की श्रेणी में खड़ा करती थी।
कुरुक्षेत्र का युद्ध अपने पंद्रहवें दिन में प्रवेश कर चुका था। आकाश में चीलों का शोर था और धरती रक्त से सराबोर होकर लाल हो चुकी थी। पांडव सेना के मनोबल का बांध टूट रहा था, क्योंकि सामने आचार्य द्रोण खड़े थे। वे द्रोण, जिन्होंने शस्त्र विद्या को परिभाषा दी थी। उनके हाथों में धनुष बिजली की तरह कौंध रहा था और उनके दिव्य अस्त्र पांडव सेना का तिनके की तरह सफाया कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि यदि सूर्यास्त तक द्रोणाचार्य के हाथ से धनुष नहीं छूटा, तो धर्म की पराजय निश्चित है।
किंतु द्रोण अजेय थे। उन्हें पराजित करने का कोई भौतिक मार्ग शेष नहीं था। उनकी एकमात्र दुर्बलता थी—उनका पुत्र मोह। अश्वत्थामा, जो उनके प्राणों का आधार था। श्रीकृष्ण ने एक ऐसी चाल चली जो इतिहास के पन्नों पर सदा के लिए एक प्रश्नचिह्न बन गई। भीम ने अपनी गदा के एक प्रहार से मालवा नरेश के ‘अश्वत्थामा’ नामक हाथी का वध कर दिया। चारों ओर जयघोष होने लगा— “अश्वत्थामा मारा गया! अश्वत्थामा मारा गया!”
जब यह क्रंदन द्रोणाचार्य के कानों तक पहुँचा, तो उनके हाथ कांप गए। हृदय काँप उठा, किंतु विवेक जागृत था। उन्हें लगा कि उनका अमर पुत्र ऐसे कैसे मर सकता है? उन्होंने चारों ओर देखा। उनकी दृष्टि ठहरी धर्मराज युधिष्ठिर पर। युधिष्ठिर—जिनका रथ अपनी सत्यवादिता के कारण धरती से चार अंगुल ऊपर हवा में चलता था। द्रोण ने पुकारा, “हे कुंतीपुत्र! तुम असत्य नहीं बोल सकते। बताओ, क्या मेरा पुत्र अश्वत्थामा वास्तव में वीरगति को प्राप्त हुआ?”
युधिष्ठिर का अंतर्मन चीख रहा था। सामने धर्म की रक्षा का प्रश्न था और दूसरी ओर स्वयं का सत्य। श्रीकृष्ण के संकेत पर युधिष्ठिर ने अपने जीवन का सबसे कठिन वाक्य कहा:
“अश्वत्थामा हतः, इति नरो वा कुंजरो वा…”
(अश्वत्थामा मारा गया, पर मनुष्य या हाथी…)
जैसे ही युधिष्ठिर ने “नरो वा कुंजरो वा” कहना शुरू किया, श्रीकृष्ण ने अपना पांचजन्य शंख इतनी जोर से फूँका कि द्रोणाचार्य को अंतिम शब्द सुनाई ही नहीं दिए। उन्हें लगा उनका पुत्र मर गया। शोक की उस अग्नि में आचार्य ने अपने अस्त्र त्याग दिए और समाधिस्थ हो गए। इसी क्षण धृष्टद्युम्न ने उनका मस्तक धड़ से अलग कर दिया।
जैसे ही द्रोणाचार्य का प्राण-पखेरू उड़ा, एक चमत्कार हुआ—परंतु वह नकारात्मक था। युधिष्ठिर का वह दिव्य रथ, जो वर्षों से धरती को स्पर्श नहीं करता था, एक झटके के साथ धूल में गिर गया। सत्य की वह आभा धुंधली पड़ गई। युधिष्ठिर ने युद्ध तो जीत लिया, पर अपनी वह ‘दिव्यता’ खो दी जो उन्हें साधारण मनुष्यों से अलग करती थी।
यह कहानी हमें उस सूक्ष्म दहलीज पर खड़ा करती है जहाँ ‘स्वार्थ’ और ‘सत्य’ का संघर्ष होता है। युधिष्ठिर का रथ जमीन पर गिरना महज़ एक भौतिक घटना नहीं थी, बल्कि यह इस बात का प्रमाण था कि सत्य आधा नहीं होता। जो सत्य किसी को छलने के लिए बोला जाए, वह झूठ से भी अधिक घातक होता है।
द्रोणाचार्य की मृत्यु का कारण उनका पुत्र-मोह था और युधिष्ठिर के पतन का कारण उनका ‘अर्ध-सत्य’। हम भी अपने जीवन में कई बार ‘हाथी’ मारकर ‘इंसान’ के मरने का भ्रम पाल लेते हैं। हम अपनी गलतियों को तर्क की चादर से ढंकने की कोशिश करते हैं। लेकिन याद रखिएगा, नियति का न्याय युधिष्ठिर के रथ जैसा ही सटीक है—जैसे ही आप सत्य के मार्ग से एक इंच भी डिगेंगे, आपकी आत्मिक ऊँचाई धूल में मिल जाएगी। जागिए! इससे पहले कि मोह का कोई द्रोण आपके भीतर के विवेक को मार दे, अपने सत्य को पूर्णता दीजिए।
और हमेशा ध्यान रखिए, युधिष्ठिर ने तो भगवान श्री कृष्ण के कहने पर और धर्म की रक्षा के लिए अर्ध-सत्य बोला था, लेकिन हम और आप तो अपने निजी स्वार्थो के लिए झूठ बोलते हैं तो सोचिए फिर हमारा क्या होने वाला है…!?


