सम्माननीय पाठक वृन्द !
श्री गणेश जी हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में अग्रपूज्य हैं। प्रत्येक कार्य सफलता एवं ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति और विघ्नों का नाश करने के लिए सर्वप्रथम उन्हीं का पूजन किया जाता है। वह बुद्धि के विशेष प्रतिनिधि हैं। महादेव के पुत्र होने से उनका महत्त्व और भी बढ़ जाता है।

गणेश जी की आकृति रहस्यमयी है। उनके देह के हर एक भाग से महत्त्वपूर्ण तथ्यों का रहस्योद्घाटन होता है। इनका सिर हाथी का है, हाथी पशुओं में बुद्धिमान माना जाता है, सिर पर अर्द्धचन्द्र शीतलता और शान्ति प्रदान करनेवाला है। हाथी के नेत्र भी दूसरे जीवों से भिन्न हैं, वह हर वस्तु को अपने वास्तविक आकार से बड़ा देखता है, इससे यह शिक्षा मिलती है कि दूसरों को अपने से बड़ा समझ उनका आदर करो, यह नम्रता का दैवी गुण है जिसे सभी को अपनाना चाहिए। छोटे नेत्रों का यह भी अर्थ है कि हर वस्तु का निरीक्षण-परीक्षण सूक्ष्मता से करना चाहिए। बड़े कान हैं, लम्बी नाक है, बड़ा पेट है। मनुष्य-जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए जिन गुणों की आवश्यकता होती है, उन्हें गणेश जी के रहस्यमय आकार से समझाया गया है।
प्राकृतिक जगत् अनित्य, अपूर्ण और विनाशी है फलतः दुखों का सागर है, प्राकृतिक वस्तुओं और स्थितियों में सुख की खोज करना मूर्खता है, यहां जो कुछ भी मनुष्य प्राप्त करता है, स्थायी नहीं होता अतः उसका वियोग अवश्यम्भावी है। यहाँ वास्तविक सुख उसे ही मिलता है जो समस्त जगत् को भगवानू में देखता है। वही नित्य और पूर्ण परमानन्द स्वरूप भगवान् को देखता हुआ नित्य आनन्दमय बना रहता है। भगवान् ने कहा भी है।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणशयति ।।
जीवन में जो कुछ भी हानि-लाभ, सुख-दुःख भोग रूप में प्राप्त होते हैं, वे सब प्रारब्ध के फल हैं। योनि, आयु और कर्म फलादि प्रारब्ध के अनुसार पहले ही निश्चित हो जाते हैं। अतएव जो कुछ भी प्रारब्धवंश फल रूप में मिलना है वह मिलेगा ही, लेकिन इसमें तीन निमित्त हो सकते हैं- स्वेच्छा, परेच्छा और अनिच्छा। फलभोग में प्रारब्धवश परतन्त्र होकर भी हम स्वेच्छा और परेच्छाकृत उन भोगों में अपनी भली-बुरी इच्छा के अनुसार क्रियाकर्म करके अपने लिए अच्छे-बुरे सञ्चित का निर्माण कर सकते हैं। हमें भगवान् ने अच्छे-बुरे की पहचान के लिए विवेक, शुभ कर्म करने के लिए विधिनिषेधात्मक शास्त्रवाणी और कर्म करने का अधिकार दिया है- ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते‘ गीता का प्रसिद्ध वचन है।
कुछ ऐसे प्रबल कर्म हैं जैसे सकाम भगवदाराधन, किसी के द्वारा शाप या वरदान जो तत्काल प्रारब्ध बनकर फलदानोन्मुख प्रारब्ध के फल को रोककर बीच में अपना फल भुगता देते हैं। उदाहरण के रूप में मार्कण्डेय जी का भगवान् शिव की आराधना कर दीर्घायु प्राप्त करना, राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ कर पुत्रों को प्राप्त करना। सकाम आराधना के सम्बन्ध में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उसका सभी को समान रूप से या तत्काल ही फल मिलेगा। तत्काल फल न मिले तो पुनः आराधना करनी चाहिए। एक ही दवा एक रोगी को तत्काल स्वस्थ कर देती है, दूसरे को कई बार प्रयोग करने पर तथा किसी को बार-बार प्रयोग करने पर भी परिणाम नहीं देती, लेकिन देवाराधन में प्रतिक्रिया रूप में हानि नहीं होती वरन् लाभ ही मिलता है।
तो आइए हमारे इस लेख में भगवान गणेश से जुड़ी संपूर्ण जानकारी दी गई है। प्रत्येक विषय पर विस्तृत लेख भी उपलब्ध कराया जाएगा। पढ़ें और स्मरण करें।
भगवान गणेश कौन हैं?
भगवान श्री गणेश हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य (जिनकी पूजा सबसे पहले की जाती है) और विघ्नहर्ता (सभी बाधाओं और दुखों को दूर करने वाले) देवता माने जाते हैं।
यहाँ गणेश जी के बारे में कुछ मुख्य और महत्वपूर्ण बातें दी गई हैं।
भगवान गणेश का जन्म कैसे हुआ? प्रकट्य कथा (विभिन्न पुराणों से)

जिस प्रकार वायु, शक्ति, चित्त हमें प्राप्त तो है लेकिन कहा से आई, कैसे आई इसका कोई ज्ञान नहीं हो सकता। ठीक वैसे ही भगवान और देवता जन्म नहीं लेते बस भक्तों के कल्याण के लिए प्रकट हो जाते है किसी न किसी रूप में। इसी प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ।
शिव पुराण के अनुसार भगवान गणेश के जन्म और गजानन (हाथी का मुख धारण करने वाले) बनने की अत्यंत रोचक पौराणिक कथा है अलग-अलग पुराणों में देखने से भी श्री गणेश जी प्राकट्य की कथाओं में समानता नहीं पायी जाती। नीचे हम सभी पुराणों से सार रूप में गजवदन के प्राकट्य की कथा लिख रहे हैं ताकि विनायक-भक्त इन्हें पढ़कर ज्ञान अर्जन कर सकें और अपने उपास्य देव की लीलाओं का परिचय प्राप्त कर सकें।
पद्मपुराण से
पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड में श्री गणेश के प्राकट्य की मधुर-मनोहर एवं मंगलमयी कथा इस प्रकार वर्णित है कि जब हिमगिरिनन्दिनी पार्वती का पाणिग्रहण करने के पश्चात् भगवान् शंकर रमणीय उद्यानों और एकान्त वनों में उनके साथ विहार करने लगे, परमानन्द प्रदायिनी भवानी के प्रति शुद्धांत्मा शिव के हृदय में अत्यधिक प्रेम था। एक बार की बात है शंकरार्धांगिनी पार्वती ने सुगन्धित तैल और चूर्ण से अपने शरीर में उबटन लगवाया। उस बदन से गिरे उबटन से उन्होंने क्रीड़ावश एक पुरुषाकृति का निर्माण किया, जिसका मुख गज के समान था।
जल-क्रीड़ा करते समय माता पार्वती ने उस गजमुख पुरुषाकृति को पुण्य सलिला गंगाजी के जल में डाल दिया। त्रैलोक्यतारिणी गंगा जी पार्वती जी को अपनी सहेली मानती थीं, उनके पुण्यमय जल में पड़ते ही वह खिलौना विशालाकृति में बदल गया। शंकरार्धशरीरिणी माता पार्वती ने उसे पुत्र कहकर पुकारा और सुरसरि ने भी उसे पुत्र कहा। देव समुदाय ने उसे गांगेय कहकर सम्मान दिया। कालोद्भव ब्रह्मा ने उन्हें गणों का आधिपत्य प्रदान किया। इस प्रकार गजवदन देवताओं के द्वारा पूजित हुए। यहां पढ़ें
श्री गणेश जी का स्वरूप गजानन के रूप में ही क्यों ?
गणेशजी को पार्वती का पुत्र माना जाता है। उनके जन्म के संबंध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। जैसे-ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जब उनका जन्म हुआ था तो शनि की दृष्टि पड़ने से उनका सिर कट गया था, जिस पर भगवान विष्णु ने एक हाथी का सिर काटकर उस बालक के सिर के स्थान पर जोड़ दिया था जिससे उनको सर्वप्रथम पूजन का अधिकार मिला। उपरोक्त पुराण में ही उनके एकदन्त हो जाने का वर्णन है। पूरा लेख पढ़ें
गणेश जी के 16 नाम वर्णन (16 Names of Ganesha)
कहते है भगवान् गणेश विद्या बुद्धि के दाता है, जो भी मनुष्य चाहे स्त्री हो या पुरुष यदि साचे मन से गणेश के 16 नामों का स्मरण करे तो उसके सारे कष्ट और कार्य में आ रही बाधा गणेश जी दूर कर देते है। पूरा लेख पढ़ें
गणेश चतुर्थी गणेश उत्सा एवं गणेश जी की समस्त पूजा अर्चना में लिए जाने वाले 108 नाम जिनके स्मरण मात्र से आपके सरे कष्ट कट जाते है कहा गया है यदि कोई साधक इसका नित्य स्मरण करे तो अद्भुद लाभ देखने को मिलते है तो आइये स्मरण करिए।
देवों के देव श्री गणेश जी परमात्मा स्वरूप हैं (Ganesh ji Parmatma)
श्री गणेश जी परमात्मा स्वरूप हैं कैसे तो आइये जानते है इस लेख के माध्यम से आखिर गणेश जी में यह सब कैसे है जिससे उन्हें सर्वप्रथम पूजन का वरदान दिया उसका वास्तविकता में अर्थ क्या है।
लिखित है कि गणेश शब्द का सन्धि विच्छेद करने पर गण – ईश दो शब्द होते हैं। गण शब्द का अर्थ है समूह और ईश का अर्थ है स्वामी ! अर्थात् गण का स्वामी । ‘गण’ है देवगण, देवताओं के सेवक । इसके अतिरिक्त गण के दो अक्षर ‘ग’ और ‘ण’ है जिनका विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता है- ‘ग’ ज्ञानार्थ वाचक और ‘ण’ निर्वाण वाचक है अर्थात् गणेश ज्ञान और निर्वाण के स्वामी हैं। यह परब्रह्म परमात्मा का पर्याय होता है । पूरा लेख पढ़ें
श्री गणेश पूजन सर्वप्रथम क्यों ? (Ganesh Puja)
क्या आप जानते है देवताओ में सर्व्प्रतम पूजन का अधिकारी कौन है इसके लिए कई कालों तक चर्चाएं हुई और इसी बीच एक महिमा हुई और देवताओं में अग्रगण्य होने का वर गणेश जी को उन्हें पिता श्री शंकर भगवान ने ही दिया है। इसी की एक पौराणिक कथा भी है। पूरा लेख पढ़ें।
गणेश चतुर्थी व्रत का फल और व्रत उपवास की विधि (Ganesh Chaturthi Vrat)
भगवान श्री गणेश का जन्म शिव पुराण के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी को रात्रि के प्रथम प्रहर में हुआ था जो कि गणेश चतुर्थी कहलाती है । भगवान शिव ने जब त्रिशूल से बाल गणेश का सिर छेदन कर दिया था तब पार्वती द्वारा उत्पन्न शक्तियों ने प्रलय मचा दिया था । किन्तु उसी समय भगवान विष्णु ने हाथी के शिशु का सिर जोड़कर गणेश को जीवित कर दिया था तो पार्वती जी प्रसन्न हो गई थीं । शिवजी ने गणेशजी को अनेक वर दिये थे जिनके अनुसार वे देवों के देव, हर पूजन और दीपावली में लक्ष्मी जी से पहले और हर पूजन में सर्वप्रथम पूज्य, विघ्न विनाशक और मंगल व सिद्धि प्रदाता बने। पूरा लेख पढ़ें।
श्री गणेश विसर्जन की परंपरा एवं अध्यात्मिक महत्व
ग्रंथों के अनुसार, महर्षि वेद व्यास ने महाभारत ग्रंथ की रचना करने का निर्णय लिया और इस दिव्य अनुष्ठान को संपन्न करने के लिए वेदव्यास जी ने गंगा नदी के किनारे एकांत पवित्र स्थल का चुनाव किया। लेकिन, लेखन का कार्य महर्षि के वश का नहीं था। इसलिए उन्होंने इसके लिए भगवान श्री गणेश की आराधना की और उनसे प्रार्थना करी कि वे एक महाकाव्य जैसे महान ग्रंथ को लिखने में उनकी सहायत करें। गणपती जी ने सहमति दी और दिन-रात लेखन कार्य प्रारम्भ हुआ।
इसके लिए महर्षि वेद व्यास ने गणेश चतुर्थी वाले दिन से ही भगवान गणेश को लगातार 10 दिन तक महाभारत की कथा सुनाई थी जिसे श्री गणेश जी ने अक्षरशः लिखा था। महर्षि वेद व्यास जी ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा की और लेखन का शुभ कार्य आरंभ कर दिया। पूरा लेख पढ़ें।
श्री गणेश जी के 5 महा मंत्र और गणपति वंदना (Ganesh Mantra Aur Vandana)
कहते है गणेश जी अपने हर भक्त की मनोकामना पूर्ति करते है और जो भी भक्त सच्चे मन से गणपति वंदना का पाठ करता है उसकी सारी मनोकामनाए पूर्ण होती इस लेख में हम आपके लिए गणेश जी के 5 महा मंत्र आपको बता रहे है (Ganesh Mantra Aur Vandana) जो गणेश उत्सव और गणेश पूजन में लाभकारी है। पूरा लेख पढ़ें।
