श्री राम के ईश्वर शिव हैं या शिव के ईश्वर राम है यह उलझन का विषय है और यह तर्क का विषय भी नहीं है, क्योंकि-:
शिव और राम — एक ही परम सत्य के दो प्रकाश है…
शिव राम का नाम जपते हैं और राम शिव की पूजा करते हैं। एक ओर कैलासवासी महादेव रामनाम को अपना प्राण मानते हैं, दूसरी ओर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम समुद्र तट पर शिवलिंग स्थापित करके भगवान शिव का पूजन करते हैं।
रामहि केवल प्रेमु पिआरा।
प्रभु को केवल निष्कपट प्रेम प्रिय है।
श्रीरामकथा का आरंभ शिव-वंदना से होता है
तुलसीदास जी ने रामकथा का आरंभ ही शिव और पार्वती की वंदना से किया
“भवानी शंकरौ वन्दे
श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।”
भवानी श्रद्धा का स्वरूप हैं।
- शंकर विश्वास का स्वरूप हैं।
- श्रद्धा के बिना साधना आरंभ नहीं होती।
- विश्वास के बिना साधना पूर्ण नहीं होती।
जिस हृदय में श्रद्धा और विश्वास दोनों जागते हैं, उसी हृदय में रामकथा का वास्तविक प्रकाश उतरता है।
प्रभु राम को समझने के लिए केवल बुद्धि पर्याप्त नहीं हृदय में श्रद्धा चाहिए। शिव को पाने के लिए केवल बाहरी पूजा पर्याप्त नहीं भीतर अटूट विश्वास चाहिए।
शिव — रामभक्ति के प्रथम आचार्य है।
क्योंकि रामचरितमानस में शिवजी स्वयं पार्वती को श्रीराम की कथा सुनाते हैं। इसका अर्थ यह है कि भगवान शिव केवल राम के भक्त ही नहीं, बल्कि रामतत्त्व के महान ज्ञाता और आचार्य भी हैं।
शिवजी राम के बाहरी राजसी रूप से आगे उनके परमात्मस्वरूप को देखते हैं। उनके लिए राम केवल अयोध्या के राजा नहीं, बल्कि वही परम ब्रह्म हैं जो भक्तों के कल्याण के लिए मानव रूप धारण करते हैं।
शिव की दृष्टि हमें सिखाती है कि ईश्वर को केवल उनके रूप, वेश और लीला से नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपे परम तत्त्व से पहचानना चाहिए।
शिवजी के संबंध में भक्ति परंपरा में कहा गया है कि वे निरंतर रामनाम का स्मरण करते हैं—
“राम नाम सिव सुमिरन लागा,
मिटहिं सकल भवसंकट भागा॥”
यहाँ रामनाम केवल एक नाम नहीं, बल्कि चेतना को शुद्ध करने वाली शक्ति है।
शिव का रामनाम जपना यह बताता है कि
- ज्ञान का अंतिम आश्रय भक्ति है।
- वैराग्य का अंतिम सौंदर्य प्रेम है।
- तपस्या का अंतिम फल ईश्वर-स्मरण है।
- विद्वता का अंतिम उद्देश्य अहंकार नहीं, शरणागति है।
महादेव स्वयं रामनाम में लीन हैं, तो साधारण मनुष्य के लिए नाम-स्मरण से बड़ा साधन और क्या हो सकता है?
प्रभु श्रीराम द्वारा शिव-पूजन अनोखा उदाहरण समझिए-:
लंका-विजय से पहले श्रीराम समुद्र तट पर शिवलिंग की स्थापना करके भगवान शिव की पूजा करते हैं। यही स्थान आगे चलकर रामेश्वरम् के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
यह प्रसंग अत्यंत गहरा संदेश देता है। श्रीराम स्वयं परमात्मा हैं, फिर भी वे शिव की पूजा करते हैं। इसका कारण यह नहीं कि राम शिव से छोटे हैं या शिव राम से बड़े हैं इसका कारण है—ईश्वर स्वयं संसार को आचरण द्वारा धर्म सिखाते हैं।
राम यह बताते हैं कि महानता का अर्थ दूसरों को छोटा समझना नहीं, बल्कि योग्य और पूजनीय तत्त्व के सामने विनम्र होना है।
जो व्यक्ति वास्तव में बड़ा होता है, वह झुकना जानता है।
जो भीतर से छोटा होता है, वही अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए दूसरों का अपमान करता है।
शिव द्रोही का स्पष्ट संदेश
श्रीराम का अत्यंत प्रसिद्ध वचन है—
“शिव द्रोही मम दास कहावा।
सो नर सपनेहुँ मोहि नहिं पावा॥”
अर्थात्~ जो व्यक्ति शिव का विरोधी होकर स्वयं को राम का भक्त कहता है, वह स्वप्न में भी राम को प्राप्त नहीं कर सकता।
यह चौपाई केवल धार्मिक सहिष्णुता की बात नहीं करती यह भक्ति के मूल चरित्र को स्पष्ट करती है।
यदि किसी की भक्ति से
- अहंकार बढ़े,
- द्वेष बढ़े,
- संकीर्णता बढ़े,
- दूसरे देवस्वरूपों के प्रति घृणा उत्पन्न हो,
तो वह भक्ति नहीं, बल्कि अपने मत का अभिमान है।
सच्चा रामभक्त शिव का सम्मान करेगा।
सच्चा शिवभक्त राम के आदर्शों को अपनाएगा।
शिव और राम — ज्ञान और मर्यादा है
शिव और राम के स्वरूपों को इस प्रकार समझा जा सकता है।
शिव हमें भीतर की शांति, वैराग्य, ध्यान और आत्मबोध की ओर ले जाते हैं।
राम हमें धर्म, मर्यादा, कर्तव्य, सत्य और आदर्श जीवन का मार्ग दिखाते हैं।
शिव हमें सिखाते हैं कि संसार के बीच रहते हुए भी भीतर से निर्लिप्त कैसे रहें।
राम हमें सिखाते हैं कि कठिन परिस्थितियों में भी धर्म का त्याग न किया जाए।
शिव का मौन और राम का आचरण—दोनों मिलकर पूर्ण जीवन का दर्शन बनाते हैं।
केवल ज्ञान हो और आचरण न हो, तो जीवन अधूरा है।
केवल कर्म हो और आत्मबोध न हो, तो जीवन तनावपूर्ण हो जाता है।
शिव और राम का समन्वय केवल दो देवताओं को एक मान लेने का विषय नहीं है। यह हमारे भीतर के विभाजन को समाप्त करने का संदेश है।
मनुष्य बाहर मंदिरों में देवताओं को बाँटता है,
पर परमात्मा स्वयं कभी विभाजित नहीं होता।
किसी को राम में प्रेम दिखाई देता है,
किसी को शिव में करुणा दिखाई देती है,
किसी को शक्ति में मातृत्व दिखाई देता है,
किसी को कृष्ण में माधुर्य दिखाई देता है।
रूप अनेक हैं, अनुभूति अनेक हैं, मार्ग अनेक हैं—
पर सत्य एक है।
जैसे एक ही सूर्य अलग-अलग जल-पात्रों में अलग-अलग दिखाई देता है, वैसे ही परमात्मा भक्तों की भावना के अनुसार अलग-अलग रूपों में प्रकट होता है।
रामभक्ति यदि हृदय में है, तो उसमें करुणा होगी।
शिवभक्ति यदि हृदय में है, तो उसमें विनम्रता होगी।
देवीभक्ति यदि हृदय में है, तो उसमें शक्ति के साथ मातृत्व भी होगा।
जिस भक्ति में प्रेम नहीं, वह केवल प्रदर्शन है।
जिस साधना में विनय नहीं, वह केवल अहंकार का नया रूप है।
शिव और राम दो अलग-अलग सत्ता नहीं,
बल्कि एक ही परम चेतना के दो दिव्य आयाम हैं।
शिव में राम हैं, राम में शिव हैं,
दोनों में एक ही परम तत्त्व है।
जय श्री सीताराम.. हर हर महादेव



