अलग-अलग पुराणों में देखने से भी श्री गणेश जी प्राकट्य की कथाओं में समानता नहीं पायी जाती। नीचे हम सभी पुराणों से सार रूप में गजवदन के प्राकट्य की कथा लिख रहे हैं ताकि विनायक-भक्त इन्हें पढ़कर ज्ञान अर्जन कर सकें और अपने उपास्य देव की लीलाओं का परिचय प्राप्त कर सकें। (भगवान गणेश: संपूर्ण जानकारी। जन्म, परिवार, पूजा, मंत्र, आरती, व्रत, कथा, मंदिर के बारे में)
पद्मपुराण से
पद्मपुराण के सृष्टि खण्ड में श्री गणेश के प्राकट्य की मधुर-मनोहर एवं मंगलमयी कथा इस प्रकार वर्णित है कि जब हिमगिरिनन्दिनी पार्वती का पाणिग्रहण करने के पश्चात् भगवान् शंकर रमणीय उद्यानों और एकान्त वनों में उनके साथ विहार करने लगे, परमानन्द प्रदायिनी भवानी के प्रति शुद्धांत्मा शिव के हृदय में अत्यधिक प्रेम था। एक बार की बात है शंकरार्धांगिनी पार्वती ने सुगन्धित तैल और चूर्ण से अपने शरीर में उबटन लगवाया। उस बदन से गिरे उबटन से उन्होंने क्रीड़ावश एक पुरुषाकृति का निर्माण किया, जिसका मुख गज के समान था।
जल-क्रीड़ा करते समय माता पार्वती ने उस गजमुख पुरुषाकृति को पुण्य सलिला गंगाजी के जल में डाल दिया। त्रैलोक्यतारिणी गंगा जी पार्वती जी को अपनी सहेली मानती थीं, उनके पुण्यमय जल में पड़ते ही वह खिलौना विशालाकृति में बदल गया। शंकरार्धशरीरिणी माता पार्वती ने उसे पुत्र कहकर पुकारा और सुरसरि ने भी उसे पुत्र कहा। देव समुदाय ने उसे गांगेय कहकर सम्मान दिया। कालोद्भव ब्रह्मा ने उन्हें गणों का आधिपत्य प्रदान किया। इस प्रकार गजवदन देवताओं के द्वारा पूजित हुए।
लिंग पुराण से
लिंग पुराण के पूर्वार्द्ध में सर्वपूज्य गणेशजी के प्राकट्य की कथा इस प्रकार है एक बार की बात है। देवताओं ने परस्पर विचार किया कि प्रायः सभी असुर सृष्टि स्थित्यन्तकारी वृषभध्वज एवं चतुर्मुख की आराधना कर उनसे मनोनुकूल वर प्राप्त कर लेते हैं, जिसके कारण युद्ध में वे हमें पराजित करते रहते हैं। इन शक्तिशाली दैत्यों के कारण हमें अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है। इसलिए क्यों न हम भी स्वविजय और दैत्यों के कार्यों में विघ्न उपस्थित करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए भगवान् आशुतोष से प्रार्थना करें। यह विचार कर सुर-समुदाय पार्वतीवल्लभशिव के समीप जा उनकी स्तुति करने लगा। वृषभध्वज उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवों से बोले, “हे देवगण ! अभीष्ट वर मांगो।”
देवताओं की ओर से बृहस्पति जी ने निवेदन किया- “हे करुणामूर्ति प्रभो! देव-शत्रु असुरों की आराधना से प्रसन्न होकर आप उन्हें उनके मनोनुकूल वर प्रदान कर देते हैं, जिससे वे समर्थ होकर हमारे लिए अत्यन्त कष्टकारी बन जाते हैं। उन सुरद्रोही दानवों के कार्यों में हम विघ्न उपस्थित कर सकें, कृपा करके हमें ऐसा वर दें।”
“तथास्तु!” परम सन्तुष्ट आशुतोष ने वर देकर सुर-समुदाय को आश्वस्त किया।
कुछ काल बीतने पर सर्वलोक महेश्वर शिव की पत्नी पार्वती जी के सम्मुख परब्रह्म स्वरूप स्कन्दाग्रज श्री गणेश जी का प्राकट्य हुआ। उस परम तेजस्वी बालक का मुख हाथी का था। उसके एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे हाथ में पाश था। सर्वविघ्नेश के धरती पर अवतार लेते ही सुर-समूह में प्रसन्नता व्याप गयी और वे हर्षातिरेक में सुमनवृष्टि करते हुए गजानन के चरणों में बारम्बार प्रणाम करने लगे।
त्रैलोक्यतारिणी हिमगिरिनन्दिनी दयामयी पार्वती जी ने अपने प्रिय पुत्र को अत्यन्त सुन्दर और विचित्र वस्त्राभूषण पहनाये। देवाधिदेव महादेव ने अपने प्राणप्रिय पुत्र का जातक कर्म और अन्य संस्कार करवाये। उन्होंने प्रेम-पूर्वक पुत्र को गोद में उठाकर कहा- “हे पुत्र गणेश! यह तुम्हारा अवतार दैत्यों का नाश करने के लिए हुआ है, ब्राह्मण एवं ब्रह्मवादियों के उपकार करने के लिए हुआ है, यदि कोई पृथ्वी पर दक्षिणाहीन यज्ञ करे तो तुम स्वर्गमार्ग में उपस्थित होकर उसके धर्म कार्य में विघ्न उपस्थित करो अर्थात् ऐसे यज्ञ-कर्ता को स्वर्ग मत जाने दो।
“जो भी इस जगत् में अनुचित ढंग से अन्यायपूर्वक अध्ययन, अध्यापन, व्याख्यान और दूसरे कार्य करता है, उसके प्राणों को तुम सदा ही हरण करते रहो। हे नरपुंगव प्रभो! वर्णधर्म से च्युत स्त्री-पुरुषों तथा स्वधर्मरहित व्यक्तियों के भी प्राणोंका तुम हरण करो, जो स्त्री-पुरुष तुम्हारी समय पर पूजा करते हों, उन्हें अपनी समीपता प्रदान करो। हे बाल गणेश्वर! तुम पूजित होकर सदा ही अपने भक्तों की इस लोक और परलोक में रक्षा करना। तुम विघ्नगणों के स्वामी होने से सर्वदा ही तीनों लोकों में पूजनीय होगे।
“जो लोग मेरी, भगवान् विष्णु की अथवा ब्रह्मा जी की यज्ञों द्वारा अथवा ब्राह्मणों के माध्यम से पूजा करते हैं, उन सबके द्वारा पहले तुम्हारी पूजा होगी। जो पहले तुम्हारी पूजा किये बिना श्रौत-स्मार्त या लौकिक कल्याणकारक कर्मों का अनुष्ठान करेगा, उसका मंगल भी अमंगल में बदल जायेगा।
“ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों द्वारा भी तुम सभी कार्यों की सिद्धि के लिए प्रथम पूज्य होगे।
“तीनों लोकों में जो चन्दन-पुष्प, धूप-दीप आदि द्वारा तुम्हारी पूजा किये बिना ही कुछ पाने की चेष्टा करेंगे, वे देवता हों अथवा और कोई, उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। जो लोग तुम विनायक की पूजा करेंगे, वे निश्चय ही इन्द्रादि देवताओं द्वारा भी पूजे जायेंगे। जो लोग फल की कामना से ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्रादि देवताओं की पूजा तो करेंगे किन्तु तुम्हारी पूजा नहीं करेंगे, उन्हें तुम विघ्नों द्वारा बाधा पहुंचाओगे।”
प्रभु शिव का आशीर्वाद प्राप्त करके गणपति ने विघ्नगणों को उत्पन्न किया और उन गणों के साथ सर्वात्मा शिव के चरणों में नतमस्तक हो गये। तब से लोक में श्री गणपति अग्रपूजित हैं। इसके पश्चात् श्री गणेश जी ने दैत्यों के कार्यों में विघ्न-उत्पन्न करने प्रारम्भ कर दिये।
शिव पुराण से
शिव पुराण में विनायक के प्राकट्य की कथा इस प्रकार है-भगवती पार्वती अपने प्राणपति भगवान् शंकर के साथ कैलाश पर्वत पर आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही थीं। उनके साथ उनकी विजया और जया नाम की दो प्रिय सखी भी वहीं निवास करती थीं। एक दिन भगवती की दोनों सखियां विचार करके पार्वती जी से कहने लगीं- “हे हिमगिरिनन्दिनी पार्वती! सभी गण भगवान् शिव के ही हैं। नन्दी, भृंगी आदि गण जो हमारी सेवा में हैं, वे भी भगवान् शंकर की आज्ञा में ही तत्पर रहते हैं, वे मात्र आशुतोष की अनन्यता के कारण ही द्वारपालक बने हुए हैं। यद्यपि वे भी हमारे ही हैं, तथापि आप कृपा करके हमारे लिए भी एक गण की रचना कर दीजिए।”
एक दिन की बात है कि शिवप्रिया उमा स्नानागार में जल-क्रीड़ा कर रही थीं, द्वार पर नन्दी खड़ा था। इसी समय लीलाधारी भगवान् कामारि अपनी प्रिया के पास आये। द्वार पर खड़े नन्दी ने उन्हें सूचना दी कि मां पार्वती स्नान कर रही हैं, आप भीतर प्रवेश मत करिए। भूत-भावन शंकर ने नन्दी के इस निवेदन की उपेक्षा करते हुए द्वार के अन्दर प्रवेश कर लिया और सीधे स्नानागार में भगवती के समीप पहुंचे। परम प्रभु शिव को अपने समीप देखकर उस हालत में भगवती लज्जित हो संकोचपूर्वक खड़ी हो गयीं। वे चकित थीं कि द्वार पर नन्दी के खड़े होने पर भी आशुतोष किस प्रकार यहां प्रवेश पा गये।
अब उन्हें अपनी गुणवती और मधुर-हासिनी सखियों की बात याद आयी। जया और विजया ठीक ही कहती थीं। उन्होंने मन में विचार किया, द्वार पर यदि मेरा कोई निजी गण होता तो प्राणनाथ सहसा स्नानागार में क्योंकर आ सकते थे? निश्चय ही इन गणों पर मेरा पूर्ण अधिकार नहीं है। मेरा भी कोई ऐसा सेवक होना चाहिए जो कार्य-कुशल हो और मेरी आज्ञा का अक्षरशः पालन कर सके।
इस प्रकार त्रिभुवनेश्वरी उमा ने अपने योगजल से एक गण की रचना की। यह गण सभी गुणों से युक्त था। वह विशाल शरीरधारी, परम शोभायमान और महान् बल-पराक्रम से सम्पन्न था। भगवती ने उसे नाना प्रकार के वस्त्राभूषण एवं उत्तम वर देकर कहा- “तुम मेरे पुत्र हो! तुम्हारे समान प्यारा यहां मेरा दूसरा कोई नहीं है।”
परम बुद्धिमान और परम पराक्रमी उस पुरुष ने माता पार्वती के चरणों में अत्यन्त भक्ति के साथ प्रणाम करके विनयपूर्वक कहा- “माता! आपकी प्रत्येक आज्ञा शिरोधार्य है। आप जो चाहती हैं, कृपा करके मुझे कहें, प्राण रहते मैं आपकी प्रत्येक आज्ञा
का पालन करूंगा।” “तुम मेरे पुत्र हो! सर्वथा मेरे हो।” महादेवी ने प्रसन्न होकर कहा। “तुम मेरे द्वारपाल बन जाओ। चाहे कोई हो, कहीं से आया हो, मेरी आज्ञा के बिना घर में प्रवेश नहीं होना चाहिए।” इतना कहकर शिवप्रिया उमा ने उसे एक दण्ड दे दिया
और अपने प्राणप्रिय दण्डधारी गणराज को द्वार पर खड़ा कर दिया।
कुछ देर पश्चात् कर्पूरगौर शिव वहां आ पहुंचे। जैसे ही उन्होंने द्वार में प्रवेश करना चाहा, तो गणराज ने कहा- “देव! आप कहां जाना चाहते हैं। आप माता की आज्ञा के बिना भीतर प्रवेश नहीं कर सकते। इस समय जगज्जननी स्नान कर रही हैं. आप वापिस लौट जाइए।”
शशांकशेखर शिवा के प्राण-प्रिय पुत्र से सर्वथा अपरिचित थे। चन्द्रमौलि बोले-“मूर्ख! तू किसे रोक रहा है? क्या तुझे पता नहीं, मैं कौन हूं? मैं स्वयं शिव ही यहां आया हूं।”
मातृभक्त वीर गणराज ने कहा- “आप चाहे जो कोई हों, किन्तु माता की आज्ञा के बिना भीतर प्रवेश नहीं पा सकते।”
आश्चर्यचकित होकर पार्वती-प्राणवल्लभ ने कहा- “अरे! तू बड़ा मूर्ख है। मैं उसका पति हूं, तू मेरे ही घर में मुझे जाने से रोक रहा है!” यह कहकर भगवान् शिव ने अन्दर प्रवेश करने का प्रयास किया। यह देखकर जगदम्बा-पुत्र गणेश ने पुनः उन्हें रोक दिया।
लीलानायक कामारि ने अपने गणों से कहा- “यह कौन है? मुझे अन्दर प्रवेश करने से क्यों रोक रहा है?” ऐसा कहकर स्वयं कुछ दूर जाकर खड़े हो गये।
महेश्वर के गणों ने पार्वती-नन्दन के समीप जाकर कहा- “तुम कौन हो? कहां से आये हो? तुम्हारी इच्छा क्या है? यदि तुम अपने प्राणों की रक्षा चाहते हो तो शीघ्र ही यहां से चले जाओ।”
अत्यन्त धीर-वीर गिरिजानन्दिनीनन्दन ने निर्भय होकर शिवगणों से कहा- “पहले तुम बतलाओ, तुम कौन हो? कहां से आये हो? और तुम्हारा मन्तव्य क्या है? अकारण मुझे धमकी देनेवाले तुम यहां से चले क्यों नहीं जाते?”
“हम मुख्य शिवगण और द्वारपाल हैं।” शिवगण बुद्धि-विधाता गणेश से बोले। भूत-भावन की आज्ञा से हम तुम्हें यहां से हटाने आये हैं। तुम्हें भी गण समझकर हम लोगों ने अभी तक कुछ नहीं कहा है। यदि अपनी खैर चाहते हो, तो स्वतः ही यहां से चले जाओ, अन्यथा व्यर्थ में तुम्हें मृत्यु का वरण करना पड़ेगा।”
महाशक्ति के शक्तिमान पुत्र ने कहा- “मैं पार्वती का अनुचर हूं। माता ने मुझे आज्ञा दी है कि बिना मेरी आज्ञा, कोई भी अन्दर प्रवेश न करे। तुम अपने स्वामी शिव के सेवक हो और अपने स्वामी की आज्ञा से मुझे यहां से हटाने आये हो, किन्तु तुम्हारा दुराग्रह सफल नहीं होगा। मैं तो माता की आज्ञा का पालन करूंगा ही।”
शिवगणों ने महेश्वर के समीप जाकर नम्रतापूर्वक कहा- “प्रभो! वह बालक अपने आपको माता पार्वती का पुत्र बतलाता है और उन्हीं की आज्ञा से वहां खड़ा है। वह शक्तिमान तेजस्वी बालक द्वार से हटने को तैयार नहीं है और युद्ध करने को तत्पर है।”
कर्पूरगौर शिव ने अपने गणों से सरोष कहा- “तुम एक बालक के सामने अवश हो गये? वह बालक एकाकी है। यदि युद्ध भी करना पड़े तो करो, किन्तु उसे द्वार से हटाओ।”
शिवगणों ने अपने स्वामी के चरणों में प्रणाम किया तथा शस्त्र ले युद्ध को तत्पर 4
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पार्वती-नन्दन के समीप पहुंचे। शिवगणों को सशस्त्र अपनी ओर आते देखकर निर्भय होकर उसने कहा- “शिव के आज्ञाकारी गणो! आओ, मैं अकेला ही महाशक्ति की आज्ञा का पालन करने वाला हूं। आज माता पार्वती अपने पुत्र का और त्रिपुरारि अपने गणों का बल देख लेंगे। अब भवानी और शिव का पक्ष लेकर बलवानों का बालक से युद्ध होगा। आपने तो पहले भी बहुत से युद्ध किये हैं तथा युद्ध करने में कुशल हैं। यह मेरा पहला युद्ध है और मैं एकाकी बालक हूं। गिरिजा और शिव के विवाद में हारने पर अवश्य ही तुम्हें लज्जित होना पड़ेगा।”
गणराज ने आगे कहा- “विजय और पराजय हमारी-तुम्हारी नहीं, यह तो माता अम्बिका और भगवान् आशुतोष की होगी। तुम अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करो, मैं युद्ध के लिए तत्पर हूं।”4
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पार्वती-नन्दन के समीप पहुंचे। शिवगणों को सशस्त्र अपनी ओर आते देखकर निर्भय होकर उसने कहा- “शिव के आज्ञाकारी गणो! आओ, मैं अकेला ही महाशक्ति की आज्ञा का पालन करने वाला हूं। आज माता पार्वती अपने पुत्र का और त्रिपुरारि अपने गणों का बल देख लेंगे। अब भवानी और शिव का पक्ष लेकर बलवानों का बालक से युद्ध होगा। आपने तो पहले भी बहुत से युद्ध किये हैं तथा युद्ध करने में कुशल हैं। यह मेरा पहला युद्ध है और मैं एकाकी बालक हूं। गिरिजा और शिव के विवाद में हारने पर अवश्य ही तुम्हें लज्जित होना पड़ेगा।”
गणराज ने आगे कहा- “विजय और पराजय हमारी-तुम्हारी नहीं, यह तो माता अम्बिका और भगवान् आशुतोष की होगी। तुम अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करो, मैं युद्ध के लिए तत्पर हूं।”
बालक गणपति के इन तीक्ष्ण वाक्शरों से क्रुद्ध होकर शिवगणों ने गणेश जी पर आक्रमण कर दिया। गणेश जी के भीषण प्रहारों से शीघ्र ही सब गण घबरा गये। उस समय शिवगणों को गणपति इस प्रकार दिखाई पड़ रहे थे, जिस प्रकार कल्प के अन्त में भयंकर काल दिखलाई पड़ता है। वे सभी शक्ति-पुत्र के असह्य प्रहारों से अपने आपको बचाकर इधर-उधर भागने लगे।
शिवगणों का किसी बालक से भयंकर संग्राम हो रहा है, ऐसा समाचार नारद जी से सुनकर विधाता और चक्रपाणि (ब्रह्माजी, विष्णु भगवान्) दोनों कामारि के समीप जाकर बोले, “प्रभो! इस समय आप कैसी लीला कर रहे हैं?”
विधाता और चक्रपाणि की बात सुनकर लीलाधारी शिव बोले- “ब्राह्मण! मेरे द्वार पर एक अजेय दण्डधारी बालक बैठा है, वह मुझे अपने ही घर में प्रवेश नहीं करने दे रहा है। उस पराक्रमी बालक ने मेरे सभी पार्षदों को पराजित कर दिया है, वे उसके तीक्ष्ण प्रहारों से घायल होकर भाग रहे हैं। आप नीतिपूर्वक उसे समझाइए।”
विधाता के शान्त और नीतिवचनों का भी बालक पर जब कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो चक्रपाणि बोले- “देवेश्वर! यह अजेय बालक छल द्वारा ही समाप्त हो सकता है। विभो ! मैं मोहित करता हूं, दूसरी ओर से आप इस पर प्रहार करिए।”
भगवान् शिव ने ‘तथास्तु’ कहकर अपना त्रिशूल उठा लिया और दूसरी ओर से उन पर प्रहार किया। इस शर-प्रहार से गणेश जी का मस्तक कटकर दूर जा गिरा। देवताओं और गणों ने सन्तोष की सांस ली और हर्षातिरेक में आकर मृदंग और ढोल आदि वाद्य बजाकर नृत्य करने लगे।
अपनी सखियों द्वारा अपने पुत्र के शिरच्छेद का वृत्तान्त सुनकर और यह विदित होने पर कि देव-समुदाय और शिवगण विजय उत्सव मना रहे हैं, रुद्राणी विकल-विह्वल हो गयीं। जगज्जननी पार्वती ने मन में विचार किया कि देवताओं ने और शिवगणों ने मिलकर जैसे मेरे पुत्र को समाप्त कर दिया है, वैसे ही उन सबको मैं मृत्युमुख में झोंक दूंगी, क्योंकि पुत्र-शोक को मैं सहन नहीं कर सकती। ऐसा सोचकर माता पार्वती ने तेजस्विनी महाशक्तियों को उत्पन्न कर उन्हें आज्ञा दी कि किसी भी प्रकार का विचार किये बिना ही प्रलय मचा दो। तुम लोग देव-ऋषिगण, यक्ष-किन्नर, स्वजन-परिजन जिसको जहां पाओ, भक्षण कर लो।
फिर क्या था, वे शक्तियां मिलकर अपने कोप से जहां भी जिसे पातीं, समाप्त करती फिरने लगीं। सर्वत्र हाहाकार मच गया। सभी सुर-असुर अपने जीवन की आस त्यागकर आपस में मन्त्रणा करने लगे। सभी ने एक स्वर से कहा- “यदि शक्तिरूपा शिवा प्रसन्न हो जाएं, तभी हम सबके प्राण बच सकते हैं।”
उसी समय देवर्षि नारद जी वहां आ पहुंचे। सभी ने उन्हें अपनी व्यथा-कथा कह सुनायी और कहा- “परमेश्वरी गिरिजा के प्रसन्न हुए बिना हमारा कल्याण सम्भव नहीं परन्तु क्रुद्धा-नित्यसिद्धा पार्वती के समीप जाए कौन?”
नारद जी के साथ समस्त देवगण और ऋषिगण जगज्जननी के समीप जा उनकी स्तुति करने लगे “जगदम्बे ! आपको नमस्कार है। शिवपत्नी ! आपको प्रणाम है। अम्बे ! आपको बारम्बार प्रणाम है। चण्डिके ! आप ही आदि शक्ति हैं, आप ही जगत् की सृष्टि-स्थिति-संहारकर्जी हैं। देवेशि! आपके कोप से त्रिलोकी विकल हो रहा है। आप अब प्रसन्न हो जाओ और अपने क्रोध को शान्त करो। देवि ! हम सब लोग आपके चरणों में शीश नवाते हैं।”
इस प्रकार प्रार्थना कर समस्त देवता और ऋषिगण भगवती के सम्मुख हाथ जोड़कर शीश झुकाकर खड़े हो गये। उनका स्तवन सुनकर सर्वलोकमहेश्वरी पार्वती का हृदय द्रवित हो गया और वे बोलीं- “ऋषियो ! यदि मेरा पुत्र पुनः जीवित हो जाए और आप लोगों के मध्य पूजनीय माना जाए तथा उसे सर्वाध्यक्ष पद प्रदान किया जाए तभी लोक में शान्ति हो सकती है, अन्यथा नहीं।”
ऋषिगण बोले- “ठीक है, वही करना चाहिए जिससे त्रिलोकी को सुख मिले।” सभी त्रैलोक्यपति शिव के समीप पहुंचे और शिवा का सन्देश उन्हें दिया।
कर्पूरगौर ने कहा, “ठीक है।” तथा अपने गणों को आज्ञा दी, “उत्तर की ओर जाओ और उत्तर की ओर सिर करके सोता जो प्राणी मिले, उसी का मस्तक काट कर ले आओ।” महेश्वर की आज्ञा पा उनके पार्षद उत्तर दिशा को चले गये। देवताओं ने मृत शिशु के कबन्ध (सिररहित शरीर) को धो-पोंछकर विधिपूर्वक उसका पूजन किया।
शिवगणों को सर्वप्रथम एक गज मिला, जिसका एक ही दांत था। वे उसी गज का मस्तक लेकर आ गये। महेश्वर ने गज का मस्तक बच्चे के शरीर से जोड़ दिया और अपनी योगमाया से बच्चे को जीवित कर दिया। यह सौभाग्यशाली बालक विचित्र आकार प्रकार का हो गया। उसका मस्तक हाथी का था, शरीर का रंग लाल था, चेहरे पर प्रसन्नता खेल रही थी। उसकी कमनीय आकृति से सुन्दर प्रभा फैल रही थी।
जननी ने प्रसन्न होकर अपने प्रिय पुत्र को गोद में उठा लिया और बोलीं “तुम्हें बड़ा कष्ट उठाना पड़ा। तेरे मुख पर सिन्दूर लगा है इसलिए जो मनुष्य सिन्दूर, गन्ध-पुष्यादि से तुम्हारी पूजा करेगा, उसके सब मनोरथ सफल होंगे। उसके सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा। सभी देवताओं ने भी उन्हें पृथक् पृथक् वर प्रदान किये और उन्हें प्रथम पूज्य मान लिया।
ब्रहावैवर्त पुराण से
जब शैल-पुत्री पार्वती के साथ वृषभध्वज का पाणिग्रहण हो गया तो चराचरात्मा शिव उन्हें लेकर वन में चले गये। दीर्घकाल तक देवाधिदेव महादेव का विहार चलता रहा। एक दिन धर्मज्ञा पार्वती ने भगवान् शंकर से निवेदन किया “प्रभो! मैं एक श्रेष्ठ पुत्र चाहती हूं।”
सर्वभूतपति भगवान् त्रिपुरारि ने अपनी धर्मपरायणा पत्नी की बात सुनकर कहा- “प्रिये! मैं तुम्हें एक श्रेष्ठ व्रत की विधि बतलाता हूं। इस व्रत का नाम पुण्यक व्रत है। इसका अनुष्ठान एक वर्ष का है। धर्मात्मा मनु की पत्नी भी पुत्र न होने से जब क्लेशयुक्त थीं, तो उन्होंने विधाता से पुत्र-प्राप्ति का उपाय पूछा था। वे ब्रह्मलोक में जा विधाता से विनयपूर्वक बोलीं- “प्रभो! आप सृष्टिकर्ता और कारणों के भी कारण हैं। पुत्र के बिना गृहस्थ का क्या अर्थ अर्थात् गार्हस्थ्य-जीवन नीरस और व्यर्थ ही है। पुत्र के बिना स्त्री-पुरुष का जन्म, अन्न-धन सब निष्फल है। तप और दान का फल जन्म-जन्मान्तर में सुख का हेतु होता है, परन्तु पुत्र ‘पुञ्’ नामक नरक से रक्षा करता है। इसलिए वन्ध्या को पुत्र किस उपाय से हो सकता है, आप कृपापूर्वक कहें।”
विधाता बोले, “मैं तुम्हें एक व्रत बतलाता हूं, जो सम्पूर्ण मनोरथों को देने वाला तथा परम शुभद है। यदि तुम इसका अनुष्ठान करोगी तो निश्चय ही श्रीहरि के समान श्रेष्ठ और पराक्रमी पुत्र प्राप्त कर लोगी। व्रत काल में (एक वर्ष पर्यन्त) वेदोक्त वस्तुओं का दान करते रहना चाहिए। यह व्रत माघ मास की त्रयोदशी के दिन (शुक्लपक्ष की त्रयोदशी) से प्रारम्भ किया जाता है। व्रती को चाहिए कि व्रत आरम्भ से पहले दिन अर्थात् द्वादशी को उपवास रखे तथा अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में शय्या त्यागकर, नित्यकर्म से निवृत हो, श्रीहरि के मन्दिर में जा, उन्हें अर्घ्य दे और शीघ्र घर लौटकर किसी सुयोग्य ब्राह्मण को आचार्य पद के लिए वरण करके स्वस्तिवाचनपूर्वक कलश स्थापन करे, फिर संकल्प सहित इस महान् व्रत का अनुष्ठान प्रारम्भ करे।
“देवि ! पुत्र-प्राप्ति के लिए कूष्माण्ड, नारियल, श्रीफल तथा जम्बीर आदि फलों को श्रीहरि की सेवा में समर्पित करना चाहिए। नाना प्रकार के वाद्यों-संगीतों से श्रीहरि को प्रसन्न करना चाहिए, उनकी भक्ति की विशेष उपलब्धि के लिए सुगन्धित पुष्पों की एक लाख माला अर्पण करनी चाहिए। उनकी तुष्टि के लिए विविध प्रकार के स्वादिष्ट व्यञ्जनों का भोग लगाना चाहिए तथा इस काल में व्रती को प्रतिदिन एक सहस्र ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।
“सुव्रते ! प्रतिदिन पूजा के समय सुगन्धित सुमनों से भरी सौ अञ्जलियां समर्पित कर निखिल पावन प्रभु के चरणों में सौ बार प्रणाम करना चाहिए। व्रत काल में छः महीने तक हविष्यान्न (अगहनी धान, मूंग, तिल, जौ, मटर, तिन्नी, साठी, दूध, दही, घी, शक्कर, लौंग, जीरा, पीपल, सेंधा नमक, बथुआ, मूली, आम, इमली, कटहल, नारंगी, केला, हरें और आंवला आदि हविष्यान्न कहे जाते हैं), पांच मास तक फलाहार, एक पक्ष तक हवि का आहार और एक पक्ष तक केवल जल पर ही निर्भर रहे।
“इस विधि से व्रत करके उसका उद्यापन करे। सुन्दर वस्त्रों से आच्छादित अति उत्तम उपहारों से सज्जित तीन सौ साठ डलियां, भोजन के पदार्थ और यज्ञोपवीत का दान करे। एक हजार तीन सौ साठ घृत आहुतियां देकर हवन करे तथा इतने ही ब्राह्मणों को इच्छित भोजन कराके उन्हें एक स्वर्ण मुद्रा की दक्षिणा दे। इस व्रत के करने से श्रीहरि के चरणों में सुदृढ़ भक्ति हो जाती है, विख्यात पुत्र, पति-सौभाग्य एवं अपरिमित धन की प्राप्ति होती है।
“लोक पितामह की प्रेरणा से सती शतरूपा ने इस परम शुभदव्रत को किया था और व्रत के प्रभाव से उनके यहां प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो सुन्दर और यशस्वी बालक उत्पन्न हुए थे। महाभाग देवहूति ने भी व्रत करके श्रीहरि के अंश कपिल जी को पुत्र रूप में पा लिया था। देवमाता अदिति के यहां वामन भगवान् उत्पन्न हुए थे। इस महिमामय व्रत के प्रभाव से अनेकानेक महाभाग पुत्रवती हुई हैं। प्राणवल्लभे! तुम इस व्रत का श्रद्धा-भक्ति युक्त पालन करो। तुम्हें निश्चय ही परम दुर्लभ पुत्ररत्न प्राप्त होगा।”
कर्पूरगौर के ऐसे वचन सुन सती पार्वती ने भी यह पुण्यवान् व्रत किया था। पुत्रोत्पत्ति की प्रसन्नता में स्वर्गापवर्गदाता पार्वतीनाथ की प्रेरणा से अनेक वाद्य बजने लगे। पुत्र की मंगल कामना से परम पिता शिव ने ब्राह्मणों, वन्दियों एवं भिक्षुकों को नाना प्रकार के अपरिमित रत्नादि और बहुमूल्य सम्पत्ति का दान किया। प्राणीमात्र के सच्चे शुभैषी जन्मदाता शिव के घर में शिशु के प्रकट होने पर सभी देवता, ऋषिगण आनन्दोन्मत्त हो गये थे। उन सभी ने बालक के मंगल के लिए कामनाएं की। सभी वहां पधारे, ऋषि-मुनियों ने बालक को आशीर्वाद दिये।
जैसे अन्य देवतादि गौरीनन्दन को देखने आये थे, इसी प्रकार सूर्य-पुत्र शनैश्चर ने भी भूतभावन के घर में प्रवेश किया। जगज्जननी पार्वती नवागत शिशु को गोद में लिये विराजमान थीं। महायोगी शनैश्चर ने जननी पार्वती के चरणों में प्रणाम निवेदन किया और मस्तक झुकाये खड़े रहे। जगदम्बा ने उन्हें आशीष देकर उनसे कुशल समाचार पूछा और कहा- “ग्रहेश्वर! आपके नेत्र कुछ मुंदे हैं और आपने सिर झुका रखा है, आप मेरी और मेरे पुत्र की ओर नहीं देख रहे, उसका क्या हेतु है?”
“माता! सभी प्राणी अपने कर्म का फल भोगते हैं। शुभाशुभ कर्मों से ही सुख-दुख की प्राप्ति होती है। मेरी कथा गुप्त है, माता! आपके सम्मुख कहने योग्य नहीं है। इतने पर भी आपकी आज्ञा का उल्लंघन मैं नहीं कर रहा हूं। शंकर-प्रिये ! बाल्यकाल से ही मैं श्रीकृष्ण के चरणों का दास हूं, उनमें मेरी प्रगाढ़ भक्ति है। मैं प्रायः उन्हीं के ध्यान में तल्लीन रहता था, सर्वथा विरक्त एवं तप-निरत था, किन्तु पिताश्री ने चित्ररथ की पुत्री से मेरा परिणय करा दिया। मेरी पत्नी साध्वी, तेजस्विनी एवं तपस्विनी है। एक दिन की बात है कि वह ऋतुस्नान के पश्चात् मेरे समीप आयी थी, उस समय मैं भगवच्चरणों के ध्यान में लीन था और सर्वथा बाहरी ज्ञान से शून्य था। अपनी अवहेलना वह सह न सकी और मुझे शाप दे बैठी कि जिसकी ओर तुम देखोगे, वही छिन्नमस्तक हो जाएगा।
“यद्यपि ध्यान से विरत हो, मैंने उसे सन्तुष्ट किया, किन्तु वह पश्चात्ताप करने के बाद भी शाप लौटाने में असमर्थ रही। इसी कारण मैं जीवहिंसा के भय से अपने नेत्रों से किसी की ओर दृष्टिपात नहीं करता।”
शनैश्चर की ऐसी बात सुनकर जगदम्बा हंसने लगीं और कहने लगीं- “सम्पूर्ण विश्व ईश्वरेच्छा की अधीनता में है, तुम मेरी ओर तथा मेरे शिशु की ओर देखो।”
शनैश्चर ने मन-ही-मन विचार किया- मैं पार्वती-नन्दन की ओर देखूं या नहीं? यदि मैं इस दुर्लभ बालक की ओर देखूंगा तो निश्चय ही इसका अनिष्ट होगा, किन्तु सर्वेश्वरी की आज्ञा भी कैसे टाली जाए। इस प्रकार विचार कर योगी शनैश्चर देव ने धर्म को साक्षी रखकर गिरिजा की ओर तो नहीं शिशु की ओर बायीं आंख के कोने से दृष्टिपात किया। शनैश्चर की शापग्रस्त दृष्टि पड़ते ही भगवती उमा के प्राण-प्रिय पुत्र का सिर धड़ से अलग होकर दूर जा पड़ा। अत्यन्त दुःख से शनैश्चर ने अपनी आंख फेर ली और सिर झुकाकर खड़े हो गये।
अपने अंक में दुर्लभतम कम्बुकण्ठ शिशु का खून से लथपथ देह देखकर माता पार्वती दुःख से चीत्कार कर उठीं। यह आश्चर्यजनक दृश्य देखकर वहां उपस्थित समस्त कैलासवासी अवसन्न हो गये। मस्तकविहीन शिशु और मूर्छित उमा को देखकर श्रीहरि गरुड़ पर आसीन होकर उत्तर दिशा की ओर चल पड़े। वहां पुष्पभद्रा नदीं के तीर पर उन्हें एक गज को परिवार सहित सोते देखा। गजेन्द्र का सिर उत्तर की ओर था। यह देख श्रीहरि ने उसका मस्तक अपने चक्र से काट डाला और उसे लेकर कैलास पर आकर उसे मृत बच्चे के कबन्ध पर लगा दिया तथा अपनी योगमाया से उंसे जीवित कर दिया और उन्होंने मोहनिवारिणी अम्बिका को सचेत करके उनके पुत्र को उनकी गोद में बिठा दिया।
“बुद्धिरूपा शिवे! तुम भली-भांति जानती हो कि ब्रह्मा से लेकर कीटपर्यन्त सभी अपने-अपने कर्मों का फल भोगते हैं।” चक्रपाणि ने शोकाकुल उमा को समझाते हुए कहा, “प्राणियों के स्वकर्मजनित भोग सैकड़ों कल्पों तक प्रत्येक योनि में भोगने पड़ते हैं। सुख, प्रसन्नता, आनन्द ये पुण्य कर्म के तथा दुःख, भयादि पापः कर्म के परिणाम हैं।”
श्रीहरि की वाणी सुनकर वात्सल्यमयी माता सन्तुष्ट हो गयीं और उन परम प्रभु से प्रणाम निवेदन किया। शिव और शिवा ने चक्रपाणि श्रीहरि की स्तुति की। बच्चे के पुनः जीवित होने पर देव-समुदाय ने हर्षनाद किया। शुभ मुहूर्त देखकर श्री विष्णु ने बच्चे का संस्कार किया और आशीष प्रदान की “सुरश्रेष्ठ ! मैंने सर्वप्रथम तुम्हारी पूजा की है अतः वत्स, तुम सर्वपूज्य और योगीन्द्र होओ।”
प्रसन्न कमलनयन ने रुद्रप्रिय बालक के गले में वनमाला पहनायी। मोक्षदायक ब्रह्म ज्ञान तथा सम्पूर्ण सिद्धियां दीं और उन्हें अपने समान कर दिया तथा उनके आठ नाम रखे-
विघ्नेशश्च गणेशश्च हेरम्बश्च गजाननः ।
लम्बोदरश्चैकदन्तश्च शूर्पकर्णो विनायकः ।।
विघ्नेश, गणेश, हेरम्ब, गजानन, लम्बोदर, एकदन्त, शूर्पकर्ण और विनायक थे सब बालक के नाम रखे गये। इस प्रकार पार्वती-पुत्र गजमुख अग्रपूज्य हुए।

