श्री गणपति जी के प्रमुख अवतार। Avatars of lord Ganesha.

यूं तो परात्पर ब्रह्म श्री गजानन के असंख्य अवतार हैं किन्तु यहां हम मुद्गल पुराण में वर्णित मुख्य अवतारों का वर्णन करेंगे। उन मुख्य अवतारों में ब्रह्मधारक आठ मुख्यावतार हैं-

  1. वक्रतुण्ड,
  2. एकदन्त,
  3. महोदर,
  4. गजानन,
  5. लम्बोदर,
  6. विकट,
  7. विघ्नराज और
  8. धूम्रवर्ण।

मुद्गल पुराण में गणपति के इन आठ नामों की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि-‘वक्रतुण्डावतार’ देह ब्रह्म को धारण करने वाला है। वह मत्सरासुर का संहार करने वाला तथा सिंहवाहन वाला है। ‘एकदन्तावतार’ देही ब्रह्म का धारक और मदासुर का मारक है तथा इनका वाहन मूषक है। ‘महोदरावतार’ ज्ञान ब्रह्म का प्रकाशक और मोहासुर का वध करने वाला है तथा इनका वाहन भी मूषक है। ‘गजाननावतार’ सांख्य ब्रह्म का धारक और लोभासुर का मारक है तथा मूषक वाहन वाला है।

‘लम्बोदरावतार’ शक्ति ब्रह्म, जो कि सत्त्वरूप है, का धारक और क्रोधासुर का नाशक है तथा मूषक वाहन वाला है। ‘विकटावतार’ सौर ब्रह्म का धारक तथा कामासुर का उन्मूलन करने वाला और मयूर वाहन वाला है। ‘विघ्नराजावतार’ का वाहन शेषनाग है तथा विष्णु ब्रह्म का धारक और ममतासुर का वध करने वाला है। ‘धूम्रवर्णावतार’ शिव ब्रह्म का धारक, मूषक वाहन वाला और अभिमानासुर का वध करने वाला है।

गणेश जी का वक्रतुण्ड अवतार

    देवराज इन्द्र के प्रमाद से मत्सर नामक असुर का जन्म हुआ। उसने दैत्य गुरु शुक्राचार्य से शिव पञ्चाक्षरी मन्त्र (ॐ नमः शिवाय) की दीक्षा ली और भगवान् शिव का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए घोर तप किया। आशुतोष शंकर ने उसे भगवती पार्वती सहित प्रकट होकर दर्शन दिये और इच्छित वर मांगने को कहा। असुर ने अपने मनोनुकूल वर प्राप्त कर लिये तथा प्रसन्न कामारि ने उसे एक वर और दे दिया- “तुम्हें किसी से भय नहीं रहेगा।”

    इस प्रकार पार्वतीवल्लभ से वर प्राप्त कर मत्सर अपने निवास पर आया और शुक्राचार्य ने उसे सभी दैत्यों के राजा के रूप में अभिषिक्त किया। दैत्यों ने वरप्राप्त अपने अधिपति मत्सर से निवेदन किया कि अब आप निःसंकोच विश्व-विजय करें क्योंकि वर के प्रभाव से आपको कोई भयभीत नहीं कर सकता।

    अपने अनुचरों की इस सलाह को मानकर मत्सरासुर ने विश्व-विजय करने का निश्चय किया और अपनी विशाल सेना लेकर पृथ्वीवासी नरेशों पर आक्रमण कर दिया। पृथ्वी के नरपति उस पराक्रमी दैत्य की सेना के सम्मुख अपने को असहाय जानकर कुछ तो अपने प्राण बचा, रणभूमि से भाग निकले, कुछ ने उससे रण में लोहा लेना चाहा, वे पराजय को प्राप्त हो गये। इस प्रकार सम्पूर्ण भू-मण्डल पर मत्सरासुर का एकाधिपत्य स्थापित हो गया।

    तदन्तर गर्वोन्मत्त असुर ने पाताल लोक पर चढ़ाई कर दी। अमित शक्ति से सम्पन्न असुर ने वहां सर्वनाश मचाना प्रारम्भ कर दिया। यह देखकर पाताल के शासक शेषनाग ने उसकी अधीनता स्वीकार कर नियमपूर्वक कर देना स्वीकार कर लिया। पृथ्वी और पाताल को अपने अधिकार में लेकर ही असुर ने सब्र नहीं किया बल्कि स्वर्गलोक पर भी आक्रमण कर दिया। वरुण, कुबेर, यम आदि देवताओं को उसने रणक्षेत्र में पराजित किये और सुरेन्द्र की नगरी अमरावती को चारों ओर से घेर लिया। पराक्रमी इन्द्र भी उसका लोहा न ले सके और इस प्रकार मत्सरासुर स्वर्गलोक का भी अधिपति हो गया।

    असुरों के कारण त्रस्त देवता मिलकर कैलास पहुंचे और भगवान् शंकर से दैत्यों के उपद्रव की कथा कह सुनायी। भगवान् शंकर ने दैत्य के कुकृत्यों की निन्दा की। दैत्यराज ने जब यह समाचार पाया तो वह कैलास पर जा चढ़ा। वहां त्रिपुरारि ने दैत्य से युद्ध किया, किन्तु त्रैलोक्य-विजयी दैत्य ने भवानी-पति को भी हराकर उन्हें पाश में बांध लिया और कैलास को भी अपने अधीन कर लिया।

    मत्सरासुर ने कैलास और बैकुण्ठ का राज्य अपने पुत्रों को सौंप दिया और स्वयं मत्सरावास में रहने लगा। उन निष्ठुर दैत्यों के अत्यन्त कठोर शासन में अनीति और अत्याचार का ताण्डव होने लगा। दुखी देवता दैत्य के नाश का उपाय सोचने के लिए एकत्रित हो गये। जब उन्हें कोई मार्ग सुझाई नहीं दिया तो वे अत्यन्त दुखी और चिन्तित हुए। दैवयोग से भगवान् दत्तात्रेय देव-समुदाय के बीच आ पहुंचे।

    देवताओं की दयनीय स्थिति देखकर उन्होंने देवताओं को वक्रतुण्ड के एकाक्षरी मन्त्र ‘गं’ का उपदेश देकर उन्हें अनुष्ठान करने के लिए प्रेरित किया।

    समस्त देवताओं सहित भगवान् पशुपति भी वक्रतुण्ड के ध्यान के साथ मन्त्र का जप करने लगे। उनकी आराधना से सन्तुष्ट होकर सद्यः फलदाता वक्रतुण्ड प्रकट हो गये और उन्होंने देवताओं से कहा- “आप लोग चिन्ता न करें, मैं मत्सरासुर के गर्व को चूर-चूर कर दूंगा।”

    वक्रतुण्ड के स्मरण मात्र से गणों की असंख्य सेना शस्त्रों से सुसज्जित होकर एकत्रित हो गयी। भगवान् वक्रतुण्ड गणों सहित मत्सरासुर की राजधानी पहुंचे। शत्रुओं को द्वार पर आया जान गर्व से भरे असुर रणक्षेत्र की ओर बढ़े। जब उन्होंने गणों की असंख्य सेना को निहारा तो उनके होश उड़ गये और वे भयभीत होकर अपने स्वामी मत्सरासुर के निकट जा विनयपूर्वक बोले- “पराक्रमी शत्रु से युद्ध करना उचित नहीं है।”

    अनुचरों के ऐसे वचन सुनकर त्रैलोक्यविजयी असुर अत्यन्त कुपित हुआ और वह स्वयं शत्रु को मिटा देने के लिए रणक्षेत्र में जा पहुंचा। दोनों ओर से घमासान युद्ध होने लगा, किन्तु विजय किसी भी पक्ष की नहीं हुई। मत्सरासुर के दोनों पुत्रों ने समर-भूमि में पार्वती-वल्लभ को मूर्छित किया ही था कि वक्रतुण्ड के दो गणों ने उन दोनों को यमपुरी पहुंचा दिया। पुत्रों की मृत्यु से दैत्यराज छटपटा उठा, किन्तु दैत्यों ने अपने स्वामी को प्रतिशोध लेने के लिए शत्रु का नाश करने के लिए उत्साहित किया। अनुचरों की सलाह से जब दैत्यराज पुनः रणभूमि में पहुंचा तो वक्रतुण्ड का उसने बड़ा तिरस्कार किया।

    “दुष्ट असुर ! यदि तुझे अपने प्राणों का मोह है, तो मेरी शरण हो जा, अन्यथा तू निश्चय ही यमपुरी को जाएगा।” देवदेव वक्रतुण्ड ने प्रभावशाली शब्दों में कहा।

    पुत्रों की मृत्यु से तथा वक्रतुण्ड के महाकाय और भयानकतम स्वरूप को देखकर दैत्यराज डर गया और चरणों में शीश नवा, विनयपूर्वक वक्रतुण्ड की स्तुति करने लगा। वक्रतुण्ड मत्सरासुर से प्रसन्न हो गये और उसे अपनी अनपायनी भक्ति प्रदान की। देवताओं को पूर्ण स्वतन्त्र कराकर उन्हें भी अपनी भक्ति प्रदान की।

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