आज हम इस लेख में जैन गुरु श्रेष्ठ संत श्री शंकराचार्य जी का जीवन परिचय आपसे साझा कर रहे, कई लेख और कई जानकारियों के आधार स्वरुप हमने यह लेख तैयार किया है जिसका उल्लेख कई किताबों और ग्रंथों में भी साझा है उसी का संषिप्त वर्णन है तो आइये स्मरण करें।
श्री शंकराचार्य जी का जीवन परिचय (Shri Shankaracharya ji)
दक्षिण भारतके केरल प्रदेशमें पूर्णानदीके किनारे कलादि गाँवमें श्री शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था। उनके पिताका नाम श्रीशिवगुरु और माताका नाम श्रीसुभद्रा देवी था। श्रीशंकराचार्यजी भगवान् शंकरके अवतार ही माने जाते हैं। उनमें जन्मसे ही अद्भुत प्रभाव था। केवल सात वर्षकी अवस्थामें वे वेद तथा वेदाङ्गोंको पढ़कर उनके विद्वान् हो गये थे।
कहा जाता है कि स्नान करते समय एक मगरने बालक शंकरको पकड़ लिया। उन्होंने मातासे कहा – ‘माँ ! तुम मुझे यदि संन्यासी होनेकी आज्ञा दे दो तो मगर मुझे छोड़ देगा।’ माताने आज्ञा दे दी। योगबलसे शंकराचार्य मगरसे छूट गये। इस प्रकार आठ वर्षकी अवस्थामें संन्यास लेकर वे काशी आ गये। स्वामी श्रीगोविन्द भगवत्पादसे शंकराचार्यजीने संन्यासकी दीक्षा ली थी।
काशी में शंकराचार्य जी के प्रथम शिष्य सनन्दनजी हुए, जिनका संन्यासका नाम पद्मपादाचार्य रखा गया। साक्षात् विश्वनाथजीने प्रत्यक्ष दर्शन देकर आचार्यसे ब्रह्मसूत्रपर भाष्य लिखनेको कहा। भाष्य पूरा होनेपर एक दिन एक ब्राह्मणने आकर एक सूत्रका अर्थ पूछा। उस सूत्रके अर्थके सम्बन्धमें ब्राह्मणसे आठ दिनोंतक शास्त्रार्थ होता रहा। पीछे पता लगा कि स्वयं भगवान् व्यास ही ब्राह्मणके रूपमें शास्त्रार्थ कर रहे हैं। यह जानकर शंकराचार्य जी ने क्षमा माँगी। व्यासजीने कहा- ‘तुम्हारी आयु केवल सोलह वर्ष थी जो पूरी हो रही है। मैं उसे सोलह वर्ष और बढ़ा देता हूँ। अब धर्मकी स्थापना करो।’
काशीसे चलकर आचार्य प्रयाग पहुँचे। वहाँ वे श्री कुमारिलभट्टसे शास्त्रार्थ करने गये थे, किंतु आचार्य कुमारिल त्रिवेणी-तटपर तुषाग्नि (भूसकी आग में जलने बैठ गये थे। उन्होंने अपने प्रधान शिष्य मण्डन मिश्रसे शास्त्रार्थ करनेको कहा। माहिष्मती पुरीमें मण्डन मिश्रके यहाँ जाकर शंकराचार्यजीने उनसे शास्त्रार्थ किया। इस शास्त्रार्थमें हारकर मण्डन मिश्रने श्रीशंकराचार्यसे संन्यासकी दीक्षा ले ली। उनका संन्यासका नाम सुरेश्वराचार्य हुआ।
श्रीशंकराचार्यजीने सोलह वर्षकी अवस्थामें ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् तथा गीताका भाष्य पूरा कर लिया था। शेष सोलह वर्षोंमें वे भारतमें घूम-घूमकर सनातन धर्मकी स्थापना करते रहे। बौद्ध पण्डितोंको उन्होंने स्थान-स्थानपर शास्त्रार्थमें पराजित किया। श्रीशंकराचार्यजीके प्रभावसे भारतवर्षमें हिंदूधर्मकी स्थापना हो गयी।
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