भगवान् बुद्ध जी का जीवन परिचय

भगवान् बुद्ध जी का जीवन परिचय

आज हम इस लेख में जैन गुरु श्रेष्ठ संत श्री भगवान् बुद्ध जी का जीवन परिचय आपसे साझा कर रहे, कई लेख और कई जानकारियों के आधार स्वरुप हमने यह लेख तैयार किया है जिसका उल्लेख कई किताबों और ग्रंथों में भी साझा है उसी का संषिप्त वर्णन है तो आइये स्मरण करें।

कपिलवस्तुके राजा शुद्धोदनकी बड़ी रानी मायादेवीसे लुम्बिनी नामके स्थानमें सिद्धार्थकुमारका जन्म हुआ। यही राजकुमार सिद्धार्थ आगे जाकर बुद्ध कहलाये।

ज्योतिषियोंने कहा था कि ‘राजकुमार या तो चक्रवर्ती राजा होंगे या विरक्त होकर जगत्‌का कल्याण करेंगे।’ महाराज शुद्धोदन ज्योतिषियोंकी इस बातसे चिन्तित रहते थे।

उन्होंने राजकुमारके लिये बहुत बड़ा भवन बनवा दिया था। उस भवनमें दुःख, रोग और मृत्युकी कोई बात न पहुँचे – इसकी कड़ी व्यवस्था कर दी थी। राजकुमार उसी भवनमें रहते थे। वहाँ उनके सुखकी सब सामग्री थी। परम सुन्दरी राजकुमारी यशोधरा (गोपा)-से सिद्धार्थका विवाह हो गया और उन्हें

एक पुत्र भी हुआ, जिसका नाम राहुल रखा गया। राजकुमार सिद्धार्थ अत्यन्त दयालु थे। एक बार उन्होंने पितासे नगर देखनेकी आज्ञा माँगी। राज्यकी ओरसे ऐसी व्यवस्था गयी कि राजकुमारको नगरमें कोई दुःखद दृश्य न दीख पड़े, लेकिन होनहारको कौन रोक सकता है। नगर घूमते समय एक बूढ़ा आदमी राजकुमारको दिखायी पड़ा।

इसी प्रकार जब वे दूसरी बार नगर घूमने निकले तो एक रोगी उन्हें मिला और तीसरी बार एक मुर्दा उन्होंने देखा। इन दृश्योंको देखकर उन्होंने समझ लिया कि बुढ़ापा या रोग सबकी सुन्दरता और बलको नष्ट कर देंगे। सबको मरना पड़ेगा। इससे संसारके सब सुखोंसे उनका मन हट गया।

संसारके सुखोंसे वैराग्य हो जानेपर अमरताकी खोजका सिद्धार्थने निश्चय कर लिया। एक दिन आधी रातको वे चुपचाप राजभवनसे निकल पड़े। वे वनमें कठोर तप करने लगे।

बहुत दिनोंतक निर्जल-निराहार रहकर तप करनेसे शरीर शक्तिहीन हो गया। पीछे यह बात उनके ध्यानमें आयी कि शरीरको बहुत अधिक कष्ट देनेसे ही कोई लाभ नहीं होता। यह निश्चय करके वे वहाँसे उठे और सुजाता नामकी एक श्रद्धालु महिलाकी दी हुई खीर खाकर फिर बोधिवृक्षके नीचे आसन लगाकर बैठे। इस बार मनके सब दोषोंको- ‘मार’ को उन्होंने पराजित कर दिया। ज्ञानबोधको प्राप्त करके सिद्धार्थकुमार गौतमबुद्ध हो गये।

धर्म-प्रचारके लिये उन्होंने बड़ा श्रम किया। उनके समयमें ही सहस्त्रों भिक्षुक उनके उपदेशोंको स्वीकार करके साधनमें लग गये थे। भिक्षुणियोंकी संख्या भी कम नहीं थी। उनके अलग-अलग ‘बिहार’ (मठ) थे। इस प्रकार ४५ वर्ष धर्म-प्रचार करके ८० वर्षकी अवस्थामें कुशीनगरमें बुद्धने निर्वाण प्राप्त किया। उनके शरीरकी भस्मको देशके आठ स्थानोंमें स्थापित करके भक्तोंने उसपर स्मारक-स्तूप बनवाये।


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