श्री वल्लभाचार्य जी का जीवन परिचय

श्री वल्लभाचार्य जी का जीवन परिचय (Shri Vallabhacharya ji)

आज हम इस लेख में गुरु श्रेष्ठ संत श्री वल्लभाचार्य जी का जीवन परिचय आपसे साझा कर रहे, कई लेख और कई जानकारियों के आधार स्वरुप हमने यह लेख तैयार किया है जिसका उल्लेख कई किताबों और ग्रंथों में भी साझा है उसी का संषिप्त वर्णन है तो आइये स्मरण करें।

वैशाख कृष्ण ११ संवत् १५३५ को चम्पारण्य (रायपुर) में श्री वल्लभाचार्यजी का जन्म हुआ। उनके पिता थे श्री लक्ष्मण भट्टजी और माता श्रीइलम्मा थीं। श्री लक्ष्मण भट्टजी की सातवीं पीढ़ी से सब लोग सोमयज्ञ करते चले आये थे। कहा जाता है कि उनके वंश में सौ सोमयज्ञ पूरे होने पर ही आचार्यजी का जन्म हुआ था।

श्री वल्लभाचार्यजी ने काशीमें श्री माधवेन्द्रपुरी से वेद-शास्त्रादि का अध्ययन किया। ग्यारह वर्षकी अवस्थामें आपने सब शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। काशी से आप वृन्दावन आ गये और कुछ दिन वहाँ रहने के बाद आपने तीर्थयात्रा प्रारम्भ की। विजय नगर के राजा कृष्णदेव के यहाँ राजसभा में बड़े-बड़े विद्वानों को आपने शास्त्रार्थ में पराजित किया। वहीं पर राजाने आपको वैष्णवाचार्य की उपाधि से भूषित किया और आपकी पूजा करके बहुत-सा धन दिया। उस धन का अधिकांश आपने वहीं विद्वानों में बाँट दिया।

स्वप्नमें भगवान्‌ का आदेश होनेपर अट्ठाईस वर्ष की अवस्था में इन्होंने विवाह किया। इनके पुत्र श्री विठ्ठलनाथजी के रूप में स्वयं विठ्ठल भगवान् ही प्रकट हुए थे, ऐसी भक्तों की मान्यता है।

जीवनके अन्तिम दिनोंमें श्री वल्लभाचार्य जी काशीमें रहते थे। कहा जाता है वहाँ हनुमानघाट पर गंगा स्नान करके वे खड़े हुए और सशरीर परमधाम चले गये। इस प्रकार ५२ वर्ष की अवस्था में सं० १५८७ में उनका परमधामगमन हुआ।

श्री वल्लभाचार्यजी चैतन्य महाप्रभु के समकालीन थे और उनसे मिले भी थे। इनकी अष्टयाम सेवा बड़ी ही सुन्दर है। भगवान् श्री कृष्ण की उपासना वात्सल्य भाव से करने का इन्होंने प्रचार किया; क्योंकि वात्सल्य भाव सर्वथा निष्काम भाव है। उसमें बालरूप श्रीकृष्णसे कुछ माँगने या चाहने को स्थान ही नहीं है। उसमें तो श्री कृष्ण की सेवा तथा उनसे स्नेह करना ही है।

श्री वल्लभाचार्य के मतको शुद्धाद्वैत कहा जाता है। इसे पुष्टिमार्ग भी कहते हैं; क्योंकि इस मार्गके अनुसार भगवान्की कृपा ही भक्तों के भक्ति भाव को पुष्ट करती है। यह रुद्रसम्प्रदाय कहा जाता है। भगवान् शंकर इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक आदिगुरु माने जाते हैं।

श्री वल्लभाचार्यजी के समय में ही सूरदासजी हुए हैं और उन्होंने आचार्यकी शरण ले ली थी। अष्टछापके अन्य कवि भी वल्लभसम्प्रदायके ही थे। उनके काव्योंमें श्रीकृष्ण-प्रेमकी अद्भुत रसधारा बही है।


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