आज हम इस लेख में गुरु श्रेष्ठ संत श्री मध्वाचार्य जी का जीवन परिचय आपसे साझा कर रहे, कई लेख और कई जानकारियों के आधार स्वरुप हमने यह लेख तैयार किया है जिसका उल्लेख कई किताबों और ग्रंथों में भी साझा है उसी का संषिप्त वर्णन है तो आइये स्मरण करें।
श्री मध्वाचार्य जी का जीवन परिचय (Shri Madhvacharya ji)
मद्रास के मंगलूर जिले में उडूपी क्षेत्र से कुछ दूर बेललि ग्राम है। वहीं भार्गव गोत्रीय नारायणभट्टका निवास था। उनकी पत्नी वेदवती को माघ शुक्ल सप्तमी संवत् १२९५ को एक तेजोमय पुत्र हुआ। पिताने बालक का नाम वासुदेव रखा।
वासुदेव बचपनमें बड़े बलवान् और हृष्ट-पुष्ट थे। लोग उन्हें ‘भीम’ कहा करते थे। बहुत थोड़ी अवस्था में ही उन्होंने शास्त्रों का अध्ययन कर लिया और संन्यास लेने की इच्छा की। उनकी अद्भुत प्रतिभा और योगशक्ति की सिद्धियाँ देखकर माता-पिताने संन्यास लेने की अनुमति दे दी। ग्यारह वर्ष की अवस्था में वासुदेव ने श्री अच्युत पक्षाचार्य जी से संन्यास की दीक्षा ले ली। उनका संन्यास का नाम पूर्णप्रज्ञ रखा गया। श्री पूर्ण प्रज्ञ स्वामी को ही श्री मध्वाचार्य कहा जाता है।
श्री मध्वाचार्य जी ने तीर्थयात्रा प्रारम्भ की। यात्रामें स्थान- स्थानपर शास्त्रार्थ करके उन्होंने भक्ति की स्थापना की। इस यात्रा में ही उन्होंने गीता का भाष्य लिखा। श्री बद्रीनाथ में भगवान् व्यास ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर शालिग्राम जी की तीन मूर्तियाँ दीं, उडूपी में उनके द्वारा स्थापित करायी और भी मूर्तियाँ हैं।
श्री मध्वाचार्य जी का जीवन त्याग और भगवत्प्रेममय रहा है। एक बार एक व्यापारी के डूबते जहाज को उन्होंने बचाया। वह व्यापारी अपनी आधी सम्पत्ति इन्हें देने लगा; किंतु धन लेना आचार्यने स्वीकार नहीं किया। अपनेसे द्वेष करनेवाले और अपनी हानि करनेवाले शत्रुओंपर भी उन्होंने कभी क्रोध नहीं किया। उनसे भी सदा प्रेम का ही व्यवहार किया।
आचार्य सदा भगवच्चिन्तन में ही लगे रहते थे। अपने जीवन के अन्तिम भागमें वे सरिदन्तर नामके स्थानमें रहते थे। वहीं उन्होंने परमधाम प्रयाण किया।
श्री मध्वाचार्य के मतको द्वैतवाद कहा जाता है। भगवान् सर्वेश्वर हैं और अनन्त जीव उनके वशवर्ती हैं। भगवान् का भजन करनेसे ही जीव दुःखों से सदा के लिये छुटकारा पा सकता है।
श्री मध्वाचार्य जी का उपदेश है- ‘संसारके व्यर्थके झंझटोंको सोचनेमें अपना समय नष्ट मत करो। भगवान्में ही अपने चित्तको लगाये रहो। विचार, श्रवण, ध्यान और स्तुतिसे महान् कोई कार्य नहीं है। भगवान्के चरणकमलोंका स्मरण करने की चेष्टामात्र से तुम्हारे सब पाप नष्ट हो जायँगे।’
‘भगवान्का नित्य स्मरण करना चाहिये, जिससे मृत्यु के समय भी भगवान् का स्मरण हो। उस समय भगवान्की विस्मृति न हो।’
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