शास्त्रों में कहा गया है रामायण में हनुमान जी को रावण के पुत्र त्रिलोकी विजयी मेघनाद (इन्द्रजीत) ने बंदी बनाया था यह बात कितनी सत्य है इसके विषय में हम आपको विस्तार से बताने वाले है तो आइये जानते है पूरी जानकारी तरह इस लेख में।
रामायण में हनुमान जी को बंदी बनाये जाने का प्रसंद का उल्लेख दोनो रामायण में आपको पढने को मिलता है फिर वो चाहे वाल्मीकि रामायण हो या गोस्वामी तुलसीदास कृत श्री रामचरितमानस के सुन्दरकांड में मिलता है इसके अलावा एक प्रसंग उत्तरकाण्ड में भी आता है लेकिन प्रचलित व्याख्या में यही है।
जब संकटमोचन स्वयं बने बंदी, हनुमान जी के जीवन का एक सुन्दर प्रसंग
श्री रामायण की कथा में साहस, भक्ति और बुद्धिमत्ता के अनगिनत ऐसे उदाहरण मिलते हैं। जो आपको आपको एक मर्यादा और धर्म के प्रति प्रेरक करने के लिए पर्याप्त है लेकिन इनमें से सबसे रोचक और सीख देने वाला प्रसंग यह है, जब महाबली हनुमान जी को लंका में बंदी बना लिया गया था। जिस महाबली हनुमान में पूरी लंका को पल भर में तहस-नहस करने की शक्ति थी, आखिर उन्होंने स्वयं को बंदी क्यों बनने दिया? आइए जानते हैं इस अद्भुत प्रसंग के बारे मे।
अशोक वाटिका की तबाही और मेघनाद का प्रवेश
माता सीता की खोज में लंका पहुँचे हनुमान जी जब अशोक वाटिका में सीता जी से मिले, तो उन्होंने लंका की शक्ति और रावण के हौसले को आजमाने का निर्णय कर लिया। उन्होंने अशोक वाटिका के वृक्षों को उखाड़ना और राक्षसों का संहार करना शुरू कर दिया।
जब रावण के बड़े-बड़े योद्धा हनुमान जी को रोकने में असफल रहे, तब रावण के पराक्रमी पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) ने युद्ध भूमि में प्रवेश किया। मेघनाद और हनुमान जी के बीच भयंकर युद्ध हुआ। मेघनाद ने कई दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन हनुमान जी को डिगा न सका।
जब मेघनाद ने देखा कि हनुमान जी साधारण अस्त्रों से वश में नहीं आ रहे हैं, तो उसने अंततः अचूक ब्रह्मास्त्र का संधान किया।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, हनुमान जी चाहते तो ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से बच सकते थे क्योंकि उन्हें ब्रह्मा जी से कई वरदान प्राप्त थे। लेकिन उन्होंने मन में विचार किया:
“यदि मैं ब्रह्मास्त्र का आदर करते हुए नहीं बंधूँगा, तो सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की अपार महिमा और उनके अस्त्र का अनादर होगा।”
श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी ने हनुमान जी के बंदी होने के प्रसंग को चौपाई और दोहों में बड़े ही सुन्दर तरीके से लिखा है मेघनाद ने जब ब्रम्हास्त्र चलाया तो हनुमान जी ने परमपिता ब्रम्ह्मा जी के प्रति सम्मान दिखाते हुए स्वयं को समर्पित कर दिया
ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह विचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥
हनुमान जी ने न केवल ब्रह्मा जी के सम्मान में स्वयं को समर्पित किया, बल्कि इसके पीछे उनकी एक गहरी कूटनीति भी थी। वे चाहते थे कि रावण के दरबार में सीधे जाकर उसकी शक्ति, मंत्रियों की मानसिकता और लंका की सुरक्षा व्यवस्था का आकलन किया जा सके। इसलिए, वे चुपचाप नागपाश के बंधन में बंध गए और मेघनाद उन्हें बंदी बनाकर रावण की सभा में ले गया।
इस प्रसंग से हमें क्या सीख मिलती है?
- अहंकार का त्याग और मर्यादा का पालन: हनुमान जी असीमित शक्तियों के स्वामी थे, फिर भी उन्होंने मर्यादा और बड़ों (ब्रह्मा जी) के अस्त्र का सम्मान करने के लिए खुद को झुकना स्वीकार किया।
- बल से बड़ी बुद्धि: हर परिस्थिति का सामना सिर्फ शारीरिक बल से नहीं, बल्कि कूटनीति और बुद्धिमानी से किया जाना चाहिए। हनुमान जी का बंदी बनना उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था।
- समर्पण में ही विजय है: प्रभु कार्य के लिए जब हनुमान जी ने स्वयं को बंधनों में सौंप दिया, तो वही बंधन आगे चलकर पूरी लंका के दहन और रावण के सर्वनाश का कारण बने।
हनुमान जी का यह रूप हमें सिखाता है कि कभी-कभी जीवन में दो कदम पीछे हटना या किसी मर्यादा के कारण झुक जाना हमारी हार नहीं, बल्कि आने वाली बड़ी जीत की तैयारी होती है।
भगवानम डॉट कॉम पर हमने आपके लिए कुछ नए भाग भी जोडें है जिससे आपको और भी अन्य जानकारियां प्राप्त होती रहे जैसे | पौराणिक कथाएं | भजन संध्या | आरती संग्रह | व्रत कथाएं | चालीसा संग्रह | मंत्र संग्रह | मंदिर संग्रह | ब्लॉग | इन्हें भी पढ़ें और अपने विचार हमें कमेंट में बताये जिससे हम समय पर अपडेट करते रहे। हमसे जुड़ने के लिए फॉलो करें यू ट्यूब चेनल, इन्स्टाग्राम और फेसबुक से।


