मनुष्य क्यों हरता है (शास्त्र उवाच) प्रेरक कथा

(मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः)

मनुष्य परिस्थितियों से नहीं हारता …
परन्तु अपनी ही सोच- अपने ही विचार से हार जाता हैं।
“मैं नहीं कर सकता…”
“मेरे बस की बात नहीं…”
“अब बहुत देर हो चुकी है…”
यही वे अदृश्य दीवारें हैं
जो मनुष्य को उसकी वास्तविक ऊँचाई तक पहुँचने नहीं देतीं।
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।” मन ही बंधन का कारण है, और मन ही मुक्ति का।

जिस दिन तुमने अपनी सोच बदल दी,
तुम्हारे निर्णय बदल जाएँगे।
तुम्हारी ऊर्जा बदल जाएगी।
तुम्हारा आत्मविश्वास बदल जाएगा।
और धीरे-धीरे तुम्हारा पूरा जीवन बदल जाएगा।
आकाश में उड़ने से पहले
पक्षी को अपने पंखों पर विश्वास करना पड़ता है।

तुम्हारे भीतर वह शक्ति पहले से है
जो तुम्हें वहाँ तक पहुँचा सकती है
जहाँ तक अभी तुम्हारी कल्पना भी नहीं पहुँची…..।।

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