आदर्श महात्मा भगवान् ऋषभदेव जीवन परिचय

आदर्श महात्मा भगवान् ऋषभदेव जीवन परिचय (Bhagwan Rishabhdev ji)

भारतवर्ष एक ऐसी भूमि है जिसमे कई विशिष्ठ आचार्य, ऋषि मुनि और दिव्यत्माओं में जन्म लिया है और मनुष्य को एक नई दिशा देने का कार्य उनके जीवन चरित्र और उनकी सीख ने किया है, यह अलग बात है कुछ लोगो ने इसका अनुसरण किया और कुछ ने नहीं किया तो आज हम ऐसे ही एक अद्भुद आचार्य आदर्श महात्मा भगवान् ऋषभदेव का जीवन चरित्र यहाँ लिख रहे है जिनके चरित्र से आपको सीखने को बहुत कुछ मिलेगा।

सूर्यवंश में महाराज नाभि बड़े प्रतापी राजा हुए हैं। मनुके पुत्र थे प्रियव्रत, प्रियव्रत के पुत्र हुए आग्नीध्र और आग्नीध्र के पुत्र थे नाभि। इस प्रकार सत्ययुग में मनु महाराज के प्रपौत्र नाभि थे। महाराज नाभि के कोई पुत्र नहीं था। पुत्र पाने की इच्छा से उन्होंने एक बड़ा भारी यज्ञ किया। उस यज्ञ में भगवान् नारायण प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्होंने स्वयं महाराज नाभि के पुत्र रूप में अवतार लेने का वरदान दिया।

महाराज नाभि की पत्नी थीं महारानी मेरु देवी। भगवान् नारायणने उनके यहाँ अवतार लिया। इस अवतार में भगवान्‌ का नाम ऋषभदेव पड़ा। ऋषभदेव जी के बड़े होनेपर महाराज नाभि ने उनको राजगद्दी दे दी और स्वयं महारानी के साथ वन में तपस्या करने चले गये।

देवराज इन्द्र ने अपनी पुत्री जयन्ती का विवाह ऋषभदेव जी से कर दिया। बड़े प्रेम से राज्य की प्रजाका भगवान् ऋषभदेव ने पालन किया। उनके सौ पुत्र हुए। उन पुत्रों में सबसे बडे पुत्रका नाम भरत था। इन्हीं भरत के नामपर यह देश भारतवर्ष कहा जाता है। उससे पहले हम लोगों के इस देशका नाम अजनाभवर्ष था।

राजकुमार भरत के बड़े होने पर ऋषभदेव जी ने उन्हें पूरे देशका राजा बना दिया और स्वयं सब राजसी वस्त्र और आभूषण छोड़कर अवधूत वेष में निकल पडे। भगवान ने यह अवतार अवधूत तपस्वियों को उनके आचार की शिक्षा देने के लिये ही लिया था, इसलिये वे बाल बिखराये, मौनव्रत लिये देश में एक स्थान से दूसरे स्थानों में घूमने लगे।

भगवान् ऋषभदेव इस प्रकार रहते थे जैसे कोई पागल हो। वे न किसीसे बोलते थे, न किसी से कोई संकेत ही करते थे। अनेक प्रकार के योग-साधनों का उन्होंने आचरण किया।

अन्तमें उन्होंने अपने मुख में एक पत्थर रख लिया और दक्षिण भारतके वनों में घूमने लगे। मुख में पत्थर रखने का अभिप्राय यह था कि अब अन्न और जलका सर्वथा त्याग कर दिया गया है। उन्हें शरीर के सुख-दुःखका तनिक भी पता नहीं था। कहाँ जाते हैं, कहाँ बैठे हैं- यह सब उन्हें कुछ पता नहीं रहता था। वे तो अपने आनन्द स्वरूप में मग्न थे।

इसी प्रकार भगवान् ऋषभदेव वनों में घूम रहे थे कि एक वन में दावाग्नि लग गयी। जैसे यज्ञकी अग्निमें आहुति भस्म होती है, वैसे ही उस दावाग्निमें ऋषभदेव जी का वह परम पावन शरीर आहुति बन गया।

जैन-धर्म में ऋषभदेव जी को आदिनाथ या प्रथम तीर्थङ्कर कहा जाता है। जैन-धर्म के आचार्यों ने ऋषभदेव जी के आचरणों की व्याख्या करके ही अपने धर्म के नियम स्थिर किये हैं। इस प्रकार महात्मा भगवान् ऋषभदेव जी जैन धर्म के लिए प्रेरणास्रोत कहलाये और उनके जीवन से अनुसरण करके धर्मगुरुओं ने दीक्षा आदि स्वीकार करणी आरंभ की।


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