श्री महावीर स्वामी जी का जीवन परिचय

श्री महावीर स्वामी जी का जीवन परिचय (Shri Mahaveer Swami)

आज हम इस लेख में जैन गुरु श्रेष्ठ संत श्री महावीर स्वामी जी का जीवन परिचय आपसे साझा कर रहे, कई लेख और कई जानकारियों के आधार स्वरुप हमने यह लेख तैयार किया है जिसका उल्लेख कई किताबों और ग्रंथों में भी साझा है उसी का संषिप्त वर्णन है तो आइये स्मरण करें।

लगभग ढाई पौने तीन हजार वर्ष पूर्व बिहार प्रान्त के क्षत्रिय कुण्ड नामक स्थान में राजा सिद्धार्थ कुमार की राजधानी थी। उनकी महारानी त्रिशला देवी से चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को महावीर स्वामी का जन्म हुआ। माता-पिता ने उनका नाम ‘वर्द्धमान’ रखा। बालकपन में कुमार वर्द्धमान को क्षत्रिय राजकुमार के रूप में उपयुक्त शिक्षा मिली। लेकिन उनकी रूचि उसमे अधिक नहीं थी।

बचपन से ही कुमार वर्द्धमान की रुचि त्याग और तपस्या में थी। राजकुमारों के ठाट और सुखभोग उनको अच्छे नहीं लगते थे। दीन-दुःखियों की सेवा और उन्हें अन्न-वस्त्र दान करना राजकुमार का सबसे प्रिय काम था। माता-पिता के परलोक चले जानेपर तीस वर्ष की अवस्था में कुमार वर्द्धमान ने घर छोड़ दिया और वे दीक्षा लेकर वनमें जाकर तपस्या करने लगे।

पूरे बारह वर्षतक वर्द्धमान ने कठोर तप किया। वे छः-छः महीने तक निर्जल व्रत करते थे। कभी-कभी महीनों खड़े ही रहते थे, न बैठते थे, न लेटते थे और न कहीं आते-जाते ही थे। साढ़े बारह वर्ष में कुल मिलाकर केवल चौंतीस बार उन्होंने भोजन किया।

तपस्याके समय वनके पशुओं ने, विषैले कीड़ों और बर्र तथा मधुमक्खी-जैसे कष्ट देनेवाले जन्तुओं ने बार-बार उन्हें काटा और पीड़ा दी। दुष्ट मनुष्यों ने उन्हें पीटा, उनके पैर अग्निसे जला दिये और उनके कानों में लकड़ीकी कीलें ठोंक दीं। उग्र प्रकृति के देवताओं ने भी उन्हें डराया, धमकाया और तंग किया। आँधी, पानी और ओलों की मार उनपर बार-बार पड़ी। लेकिन उन महापुरुष ने चुपचाप सब कष्ट सह लिये। किसी कष्ट देने वाले पर उन्हें क्रोध नहीं आया। किसी से एक शब्द भी उन्होंने नहीं कहा। वे पर्वत के समान स्थिर और शान्त बने रहे। उनका धैर्य देखकर देवराज इन्द्र ने उन्हें ‘महावीर’ कहकर पुकारा, तभीसे उनका नाम ‘महावीर’ पड़ गया।

साढ़े बारह वर्ष की कठोर तपस्या और सहनशीलता से चित्तके सब दोष सर्वथा नष्ट हो गये। महावीर स्वामी सर्वज्ञ और महासिद्ध हो गये। इसके बाद उन्होंने संसारके लोगोंकी भलाईके लिये अपने कल्याणमय धर्मका उपदेश प्रारम्भ किया। उस समय के बड़े-बड़े विद्वान् और नरेश उनके शिष्य हुए।

श्री महावीर स्वामी जैन-धर्म के अन्तिम तीर्थङ्कर हैं। उनके उपदेश ही जैन-धर्मके मुख्याधार हैं। तीस वर्ष तक धर्म प्रचार करके बहत्तर वर्ष की अवस्था में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को पावापुरी में उन्होंने देह त्याग किया।

महावीर स्वामी जी के आज भारतवर्ष और अन्य देशों में बहुत से तीर्थ बनाये गए है। जिनमे उनके द्वारा दिए गए उपदेशों और ज्ञान से सभी जैन धर्म के प्रेमी अनुसरण करते है और प्रचार भी करते है, सत्य तो यह है जिसको कठिन तप में सुख और सेवा में पुण्य प्रतीत होता हो, कष्ट से प्रेम हो वही स्वामी महावीर के जीवन को समझ सकता है। स्वामी जी का जीवन सचमुच अद्भुद था और वो अपने ज्ञान से आज भी अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करते है।


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